10 मई 1857…..आज से ठीक 165 वर्ष पहले इतिहास के पन्नों में मेरठ का नाम अमर हो गया था। देश में आजादी का पहला बिगुल बज चुका था। अंग्रेजों को खदेड़ने के लिए क्रांति धरा पर चिंगारी सुलग रही थी। देशभर में अंग्रेजों के खिलाफ आक्रोश सड़कों पर उतर आय था। आज ही के दिन देश में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की नींव पड़ी थी। उस दिन रविवार था। गर्मी का मौसम था और अंग्रेजों ने शाम के समय चर्च जाने का फैसला लिया था। अपनी ही धुन के मस्त अंग्रेजों को भनक तक नहीं थी आखिर इतिहास में आज क्या दर्ज होने वाला है। शाम 5 बजे जैसे ही चर्च का घंटा बजा तयशुदा कार्यक्रम के तहत सड़कों पर लोग जमा होने लगे। लोगों की भीड़ ने अंग्रेजी फौज पर हमला बोल दिया।
सदर बाजार इलाके में आजादी की लड़ाई का पहला युद्ध था। इतिहासकारों के अनुसार पूरे देश में अंग्रेजो के खिलाफ लोगों का गुस्सा फूट रहा था। एक साथ पूरे देश में अंग्रेजों को खदेड़ने की योजना थी, पर मेरठ में 10 तारीख से पहले ही संग्राम छिड़ गया। इसी दौरान शाम को ही 85 सैनिक जिनका कोर्ट मार्शल किया गया था उन्हें भीड़ ने जेल तोड़कर आजाद करवा दिया। जिसके बाद सैनिकों ने दिल्ली कूच किया। 11 मई 1857 को भारतीय सैनिक दिल्ली पर कब्जा कर चुके थे।
सुनहरे अक्षरों में दर्ज हुआ इतिहास
क्रांति धारा कहे जाने वाले मेरठ में 1857 की क्रांति के गवाह रहे विक्टोरिया पार्क, शहीद स्मारक में क्रांति का इतिहास अब सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो चुका है।अंग्रेजों के खिलाफ हुए विद्रोह का हर साक्ष्य यह संजोए हुए हैं। यहां हाल ही में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के अभिलेखागार विभाग द्वारा डेढ़ हजार ऐसे दस्तावेज भेजे गए हैं। जिनमें ऐसे तमाम लोगों का जिक्र है, जिन्होंने इस विद्रोह में अपना अहम योगदान दिया था। किंतु यह अभी तक गुमनाम थे। ब्रिटिश सरकार द्वारा अलग-अलग अदालतों में इन पर मुकदमे चलाए गए थे और सजा भी हुई थी। हाल ही में शहीद स्मारक में बने संग्रहालय में इनके बारे में बारीकी से पढ़ा जा सकता है। अपनी पहचान खो चुके इन सेनानियों को अब सम्मान दिया जा रहा है।
दो सैनिकों की हत्या से रच दिया था इतिहास
1857 का विद्रोह में सैनिक मंगल पांडे और ईश्वर पांडे की भूमिका सबसे अहम रही। 29 मार्च 1857 को पहली बार विद्रोह का स्वर मुखर हुआ। इतिहासकारों के मुताबिक पश्चिम बंगाल की बैरकपुर छावनी में गाय और सुअर की चर्बी से बने कारतूस लाये जा रहे थे। लेकिन, मंगल पांडे और ईश्वर पांडे ने इनके प्रयोग से मना कर दिया। मामला बढ़ा तो दोनों से अपने अंगरेज अफ़सर का कत्ल भी कर दिया। ब्रिटिश सरकार ने 8 अप्रैल 1857 को दोनों को फांसी की सज़ा दे दी।
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सैनिकों की मौत की खबर ने दूसरे सैनिकों में विद्रोह की चिंगारी तेज़ कर दी। 10 मई 1857 को मेरठ में भी विद्रोह हुआ और सैनिकों ने यहां भी कारतूस का प्रयोग करने से इनकार कर दिया। दिल्ली कब्जा ली गयी। बहादुर शाह जफर को दिल्ली की गद्दी मिली। लोगों के दिलों में अंग्रेजी हुकूमत के ख़िलाफ़ आक्रोश बढ़ता गया। हालांकि 20 मई 1857 को अंग्रेजो ने दिल्ली पर दोबारा कब्जा कर लिया। 1858 में काफी संघर्षों के बाद ये विद्रोह ब्रिटिश सरकार दबाने में कामयाब जरूर हुई लेकिन देश में अंग्रेजों की जड़ें हिलाने में इस विद्रोह की सबसे बड़ी भूमिका साबित हुई।

