भगवान तुंगनाथ की धार्मिक मान्यता

उत्तराखंडभगवान तुंगनाथ की धार्मिक मान्यता

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मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव यहां बैल रूप में अंतर्ध्यान हुए थे। जिसके बाद उनके धड़ से ऊपर का भाग काठमांडू में प्रकट हुआ जहां आज पशुपतिनाथ मंदिर है जबकि उनकी भुजाएं-तुंगनाथ में मुख-रुद्रनाथ में, नाभि-मदमदेर में और जटा-कल्पेर में प्रकट हुई।

 माना जाता है कि महाभारत की लड़ाई के बाद पांडवों पर विराट हत्या का दोष निवारण के लिए उन्हें भगवान शिव का आशीर्वाद लेना जरूरी था लेकिन भोलेनाथ पांडवों से नाराज थे। जिस वजह से वह उनको नहीं मिल रहे थे। पांडवों से बचकर भगवान भोलेनाथ केदारनाथ में जब से लेकिन पांडव उनका पीछा करते हुए वहां भी पहुंच गए। 

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तब भगवान भोलेनाथ ने बैल रूप धारण किया था लेकिन पांडवों को जब सन संदेह हुआ कि भगवान रुद्रनाथ किसी बैल के भेष में हो सकते हैं। तब महाबली भीम ने विराट रूप लेकर दो पहाड़ियों पर अपना पैर रख दिए। जिसके बाद सभी जानवर उनके पैरों के नीचे से निकल गए लेकिन भगवान शिव भीम के पैरों के नीचे से नहीं निकल पाए। 

भगवान शिव पांडवों के दृढ़ निश्चय से प्रसन्न हुए और उन्हें दर्शन देकर उन्हें पाप मुक्त किया। जिसके बाद भगवान शिव ने अंतर्ध्यान होने का निर्णय लिया और जमीन में जाने लगे महाबली भीम ने बैल रूपी शिव को पकड़ने की कोशिश की लेकिन वह उन्हें पकड़ नहीं पाए।भीम ने बैल के एक हिस्से को पकड़ लिया बैल की पीठ के आकृति रूप केदारनाथ में पूजी जाती है। जिसके बाद उनके शरीर के अलग अलग से अलग-अलग जगह प्रकट हुए।

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 भक्ति और प्राकृतिक सौंदर्य का अनूठा संगम 

उखीमठ चोपता मार्ग पर हुकूमत से तकरीबन 4 किलोमीटर की पैदल यात्रा कर भगवान तुंगनाथ के मंदिर पहुंचा जा सकता है। प्राकर्तिक सौंदर्य से ओतप्रोत भगवान तुंगनाथ का मंदिर में पहुँच कर आप न केवल मन की शांति पाएंगे अपितु वँहा का नेचुरल ब्यूटी में आप अपने आप को खो सकते है।

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