रटस्मा कट्रोस् ! रटस्मा कट्रोस्!

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रटस्मा कट्रोस् ! रटस्मा कट्रोस्!

अनूप मणि त्रिपाठी

(सीन-1)

कुछ टूटे थे,कुछ फूटे थे। कुछ सूखे थे,कुछ भूखे थे। कुछ नग्न थे,कुछ अर्धनग्न थे। पर सब के सब मग्न थे। और सब के सब प्रसन्न थे।

झाँकी निकल रही थी, जिसे राजा दूर देश से आये अतिथि राजा के साथ देख रहा था।

‘यह चमत्कार कैसे किया आपने!’ दूर देश से आये अतिथि राजा ने विस्मित होकर पूछा।

‘तनिक ठहरिए!’ राजा मुस्कुराया।

ढोल-ढोलक की आवाजें तेज होने लगीं। यहाँ तक धरती में कम्पन्न होने लगी। भीड़ जोश से उबल पड़ी। तभी उनके बीच से एक जोरदार नारा उठा और देखते ही देखते उसने गगन चूम लिया।
‘मरध रेतख में है!’ ‘मरध रेतख में है!’ सभी एक स्वर में यह नारा लगाने लगे।

‘क्या कह रहे हैं ये लोग! क्या क्रांति की कोई बात कर रहे हैं!’ दूर देश से आये अतिथि राजा ने कुछ शंकित हो कर पूछा।

पहले तो राजा ने भीड़ की ओर हाथ हिलाकर उसका अभिवादन किया। फिर राजा ने तालियां बजाईं । राजा के इतना करते ही नारा सातवें आसमान को चूमने लगा।

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राजा ने अतिथि राजा को फिर सारा मामला समझाया,’शंकित मत हो मित्र! मरध रेतख में है… का मतलब धरम खतरे में है…’

यह जानते ही अतिथि राजा उछल पड़ा और उसके मुँह से अपनी भाषा में निकला,’रटस्मा कट्रोस्!’

अब राजा ने इसका मतलब पूछा।

तब अतिथि राजा ने बताया,’हमारी भाषा में रटस्मा कट्रोस्… का मतलब मास्टर स्ट्रोक होता है!’

यह जानते ही राजा जोर हँसा। उसके साथ अतिथि राजा भी हँसने लगा। जब दोनों हँस रहे थे, तब झाँकी नारे के साथ बहुत शान से उनके सामने से निकल रही थी।

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(सीन-2)

‘इस कहानी से हमें क्या सीख मिलती है?’ मास्टर जी ने कहानी सुनाने के बाद बच्चों से पूछा।

‘जब तक धर्म खतरे में है,तब तक राजा की गद्दी सुरक्षित है!’ एक बच्चे ने पूरे आत्मविश्वास के साथ उत्तर दिया।

मास्टर जी भाव विभोर होकर बोले,’जब तक तुम जैसे युवा रहेंगे,तब तक लोकतंत्र सुरक्षित रहेगा!’

यह कहते हुए मास्टर जी की आँखें बरबस भर आईं…

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