पौडी। उत्तराखंड को देवभूमि ऐसे ही नहीं कहा जाता है। यहां पर हर गांव और हर स्थान पर देव बसे हुए हैं। कहते हैंं हिंदुओं के 64 करोड देवी देवता हैं। उनमें से अधिकांश उत्तराखंड में निवास करते हैं। यहां पर देव और देवताओं के ऐसे मंदिर हैं जो कि विश्व में कहीं नहीं हैं। ब्रहमा का मंदिर अगर पूरे विश्च में पुष्कर राजस्थान में हैं तो राहू का मंदिर इस देव भूमि उत्तराखंड में है। इस देव भूमि में देवताओं का जितना सम्मा्न होती है उसी तरह से यहां पर पूजा के दौरान राक्षसों का सम्मान किया जाता है। इसका उदाहरण पौड़ी जिले के थैलीसैंड सहित पैठाणी गांव में बना राहू मंदिर (Rahu Mandir) हैं। देश का एक इकलौता राहू मंदिर है यह जहां पर राहू की पूजा भगवान शिव के साथ होती है। मंदिर में मान्यंता है कि अगर यहां पर किसी वजह से राहु का पूजन बाधित हो जाता है, तो शिव नाराज हो जाते हैं।
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बताया जाता है कि जब राहू का धड़ श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से काटा था तो वह यहीं पर गिरा था। राहू महामात्य के अनुसार बताया जाता है कि सागर मंथन के दौरान स्वरभानु नामक राक्षस भगवान विष्णुत स्वारूप की चाल भाप गया था। स्वरभानु ने मंथन से निकले अमृत को देवताओं की पंगत पर बैठकर पी लिया। भगवान विष्णुा के मोहनी स्व रूप ने उसको देख लिया था और वह भगवान विष्णुव के कोप का भाजन बना। भगवान विष्णुा (Lord Vishnu) ने अपने सुदर्शन चक्र से राक्षक स्वरभानु का सिर धड़ से अलग कर दिया। जिससे कि वह अमर न हो जाए, लेकिन अमृत छक चुका स्वरभानु तो अमर हो गया था। जिसका उसका नीचे का हिस्साि केतु और सिर वाला हिस्सान राहू बन गया। यही सिर कटने के बाद यहां पर गिरा थां।
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पौड़ी के गांव पैठाणी में राहू का मंदिर हैं। जिसके पीछे एक कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि जब आदिशंकराचार्य इस स्थाान पर पहुंचे तो उन्हेंथ महसूस हुआ कि यहां पर राहु का प्रकोप है। जिसके बाद उन्होंने एक और मंदिर बनवाया। इस मंदिर में भगवान शिव (Lord Shiva) के साथ राहु की प्रतिमा स्थापित हुई। अब इस मंदिर में शिव के साथ ही राहू की पूजा भी होती है। इस मंदिर में राहू की शांति के लिए देश के कोने कोने से लोग आते हैं।

