पंजाब चुनाव: फ्री बिजली के आंकडेबाज़ी में उलझाने की कोशिश

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पंजाब चुनाव: फ्री बिजली के आंकडेबाज़ी में उलझाने की कोशिश

-फरीद वारसी

पंजाब चुनाव: फ्री बिजली के आंकडेबाज़ी में उलझाने की कोशिश

उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर के साथ ही 2022 में पंजाब के भी विधानसभा चुनाव होंगे। जहां फिलहाल कांग्रेस की सरकार है। पंजाब की सत्ता में  लगतार दूसरी बार कांगे्रस की वापसी होती दिख रही है मगर……, इस मगर पर चर्चा आगे करेंगे। पहले पंजाब के राजनीतिक परिदृश्य पर एक नजर डाले तो मालूम हो कि तीन कृषि कानूनों के मुद्दे पर अकाली दल ने अटल-आडवानी के दौर में बने भाजपा से अपने गठबंधन को तोड़ लिया। आगामी विधानसभा चुनाव के लिए अकाली दल ने करीब पच्चीस साल बाद बसपा के साथ चुनावी गठबंधन किया है। पंजाब की राजनीति मेें भाजपा का कभी कुछ अपना राजनीतिक आधार नहीं रहा। भाजपा तो पंजाब में अकाली दल की बैसाखी के सहारे ही राजनीति कर रही थी। अब उस पर भी विराम लग गया। राज्य में भाजपा की स्थिति और उस पर केंद्रीय नेतृत्व की उदासनीता को देखकर लग रहा है कि भाजपा पंजाब के चुनाव को लेकर उतनी गंभीर नहीं है, जितना कि चुनाव जीतने के लिए वह दूसरे अन्य राज्यों में बेचैन रहती है। वहीं दूसरी ओर आम आदमी पार्टी बनाकर राजनीति के मैदान में उतरे अरविंद केजरीवाल पंजाब में पिछले 2014 के लोकसभा चुनाव से ही अपनी संभावनाएं तलाश रहे हैं। लेकिन 2017 के पंजाब विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को मुंह की खानी पड़ी क्योंकि पिछले चुनाव में कैप्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व का ऐसा जादू चला कि अकाली दल-भाजपा गठबंधन की बुरी तरह से हार हुई और कांग्रेस  ने एक तरफा रूप से राज्य की 117 विधानसभा सीटों में से 77 सीटें जीत कर प्रचंड बहुमत हासिल किया। वहीं अब एक बार फिर केजरीवाल पंजाब में पार्टी की किस्मत आजमते हुए नजर आ रहे हैं। हां, कांग्रेस  के लिए एक मजबूत पक्ष यह है कि आप के पास कैप्टन जैसा कोई स्थानीय बड़ा चेहरा नहीं है।

पंजाब के आगामी विधानसभा चुनाव में मुकाबला त्रिकोणीय होने की संभावना भले ही दिख रही है। एक तरफ सत्तारूढ़ कांगे्रस, तो उसके मुकाबले में अकालीदल-बसपा गठबंधन और दूसरी ओर आप की मौजूदगी है। इससे इंकार नहीं किया जा सकता है कि अकाली दल और भाजपा के अलग-अलग हो जाने से मौजूदा अकाली दल और बसपा गठबंधन बहुत अधिक सशक्त नहीं दिख रहा है। पंजाब में बसपा का राजनीतिक आधार ठीक दूसरे और राज्यों की तरह महज नाम मात्र का है। इसलिए इस गठबंधन में जो कुछ राजनीतिक आधार है वह अकेले अकाली दल का ही है, जो पहले जैसा नहीं रहा। वहीं पंजाब चुनाव जीतने के लिए बेकरार केजरीवाल ने 300 यूनिट फ्री बिजली देने की घोषणा के साथ यह भी ऐलान किया कि जिन पुराने बिलों में गड़बडी है, उन्हें भी माफ कर दिया जाएगा और नया कनेक्शन उपलब्ध कराया जाएगा। हालांकि राज्य की कैप्टन सरकार पहले से ही अपने 2017 के चुनावी वादे के तहत विभिन्न श्रेणी के उपभोक्ताओं को 200 यूनिट फ्री दे रही है। जिसका राज्य के लगभग 70 से 80 प्रतिशत घरेलू उपभोक्ताओं को लाभ मिल रहा है। राज्य में करीब एक करोड़ से अधिक बिजली उपभोक्ता हैं। किसानों को वहां पहले से ही मुफ्त बिजली मिल रही है। जबकि केजरीवाल की उपरोक्त घोषणा भ्रमजाल में उलझी प्रतीत हो रही है। जैसा कि दिल्ली में उन्होंने 200 यूनिट फ्री बिजली देने का ऐलान किया था, लेकिन 200 से ज्यादा यूनिट खर्च होने पर पूरा का पूरा बिल वसूला जा रहा है। उल्लेनीय है कि पंजाब की कैप्टन सरकार 200 यूनिट फ्री दे रही है और इससे ज्यादा यूनिट खर्च होने पर सिर्फ उतना ही बिल लिया जाता है जितना कि उपभोक्ताओं द्वारा निर्धारित छूट के बाद यूनिट इस्तेमाल किया गया हो। यानि 200 यूनिट तो माफ ही रहेगा। शायद केजरीवाल को यह लगता है कि दिल्ली की तरह पंजाब की जनता भी उनकी यूनिट के आंकडेबाजी में उलझ कर उन्हें सत्ता सौंप देगी। वैसे पंजाब के मतदाता इतने मासूम भी नहीं जितना कि केजरीवाल समझ रहे हैं।

   
अब चर्चा उस मगर….की, जिसका जिक्र ऊपर अधूरा छोड़ा गया। मालूम हो कि कैप्टन बनाम सिद्धू की राजनीतिक जंग अब राज्य के सत्ता के गलियारों से निकल कर कांग्रेस आलाकमान की चौखट  तक जा पहुंची  है। यहां यह बताते चलें कि 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा द्वारा टिकट न मिलने और बाद में आप में अपनी बात न बनती देख सिद्धू 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस  का हाथ थामा। कहा जाता है कि पार्टी की ओर से सि़द्धू को यह आश्वासन दिया गया था कि उन्हें राज्य सरकार में उपमुख्यमंत्री का पद दिया जाएगा। हालांकि कांग्रेस  आलाकमान ने इस तरह के किसी भी आश्वासन को कभी सार्वजनिक नहीं किया। लेकिन इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि सि़द्धू की राजनीतिक महत्वकांक्षाएं कुछ ज्यादा ही हैं। यहां यह बताना जरूरी है कि 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को जो जीत मिली थी, वह अकेले कैप्टन के दम पर ही मिली थी। कांग्रेस  की उस जीत में सोनिया-राहुल का योगदान कुछ भी नहीं था और प्रियंका तब राजनीति में नहीं आई थीं। बहरहाल सत्ता में आने के बाद कैप्टन ने सिद्धू को उपमुख्यमंत्री बनाने के बजाए कैबिनेट मंत्री बनाते हुए स्थानीय निकाय और पर्यटन विभाग दिया। कहा जाता है कि यहीं से सिद्धू और कैप्टन के बीच विवाद की नींव पड़ी जो समय के साथ और भी गहरी होती गई। जैसे इमरान खान के शपथ समारोह में पाक सेना प्रमुख को सिद्धू द्वारा गले लगाने पर कांग्रेस  बुरी तरह से गिर गई और कैप्टन ने खुद इसके लिए सि़द्धू की आलोचना की। एक मौके पर सिद्धू ने यहां तक कह दिया कि उनके कैप्टन अमरिंदर सिंह नहीं बल्कि राहुल गांधी हैं। जो मुख्यमंत्री कैप्टन को नागवार लगा। फिर सिद्धू ने कैप्टन पर अपनी पत्नी का लोकसभा चुनाव में टिकट काटवाने का आरोप लगाया। 2019 के लोकसभा चुनाव में पंजाब में कांग्रेस  का प्रदर्शन ठीक-ठाक ही रहा। लेकिन फिर भी सिद्धू ने कैप्टन की आलोचना की। इससे नाराज कैप्टन ने सिद्धू के विभाग में बदलाव करते हुए उन्हें ऊर्जा विभाग दे दिया और इस बदलाव से सिद्धू भड़क गए और उन्हें मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। बढ़ते-बढ़ते दोनों के बीच विवाद इतना अधिक बढ़ गया कि राज्य कांग्रेस  दो खेमों में बंटती हुई नजर आ रही है। वहीं इससे पूर्व एक बार प्रियंका ने पहल कर सिद्धू को मनाने के प्रयास किए। तो कैप्टन को शांत करने के लिए सोनिया ने एक तीन सदस्यीय कमेटी का गठन किया। लेकिन बात नहीं बनी और दोनों की पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। कहा जाता है कि सिद्धू अभी भी उपमुख्यमंत्री का पद या कम से कम प्रदेश अध्यक्ष बनने की अपनी इच्छा को छिपा नहीं पा रहे हैं। लेकिन कैप्टन नहीं चाहते हैं कि सिद्धू को राज्य मे कोई बड़ा पद मिले  या राज्य में उनका कद बढ़े। गौरतलब है कि कैप्टन को यह लग रहा है कि राहुल सिद्धू को आगे कर उन्हें किनारे लगाना चाहते हैं जो 2017 में ही कैप्टन को नेतृत्व देने के खिलाफ थे। तब सोनिया के हस्तक्षेप से कैप्टन के नेतृत्व पर मोहर लगी थी। समाचारों के अनुसार कैप्टन कांग्रेस  आलाकमान से मुलाकात किए बिना दिल्ली से वापस लौट आए। जबकि यह लेख लिखे जाने तक सिद्धू की मुलाकात भी राहुल से नहीं हो सकी। कांग्रेस के लिए बेहतर यही होगा कि वह कैप्टन और सिद्धू आपसी विवाद जल्द से जल्द सुलझाए, नहीं तो दोनों का यह आपसी घमासान चुनावों में कांग्रेस की संभावनाओं को धूमिल कर सकता है। वैसे भी दोनों की खींचतान के चलते चुनावी वर्ष में कांग्रेस का काफी समय बर्बाद हो चुका है। कांग्रेस को यह समझना होगा कि सिद्धू की तुलना में कैप्टन ही राज्य में कांग्रेस  की जीत को सुनिश्चित कर सकते हैं। अंत में यह लिखने से गुरेज नहीं कि कांग्रेस को अपने शीर्ष नेतृत्व के सवाल को भी अब जल्द से जल्द हल करने की जरूरत है। यह सवाल अनसुलझा होने के कारण सारे देश में कांग्रेस  को नुकसान हो रहा है। अब देखना यह है कि इस मामले में दस जनपथ का मौन कब टूटता है। या यही मूकदर्शक की भूमिका बनी रहेगी।

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