अमित बिश्नोई
राज्यसभा के चुनाव संपन्न हो गए, नतीजे भी आ गए. कौन कौन जीता, कौन कौन हारा। किसने किसको वोट किया, किसने चुनाव से किनारा किया। किसने खेला किया, किसके साथ खेला हुआ, सब कुछ अब सामने आ चूका है. कहने को तो उम्मीदवारों की जीत हुई है लेकिन असली जीत तो अंतरात्मा की हुई है। राज्यसभा हो या विधानपरिषद के चुनाव, इस तरह के चुनावों में अंतरात्मा का बड़ा महत्व होता है. सारा जीवन पार्टी के साथ रहकर, कभी सत्ता में तो कभी विपक्ष में मलाई सूतने वाले भी ऐसे मौकों की तलाश में रहते हैं जब उनकी अंतरात्मा जागे। ये अंतरात्मा ही है जो माननीयों को पार्टी लाइन से अलग होने पर मजबूर करती है. और इस मजबूरी में आकर ये लोग जो कदम उठाते हैं उसे राजनीतिक भाषा में क्रॉस वोटिंग कहते हैं।
अंतरात्मा ही होती है जो क्रॉस वोटिंग करवाती है, क्रॉस वोटिंग! नाम से ही बड़ा खराब लगता है, निगेटिव फीलिंग आती है, वैसे काम भी निगेटिव वाला ही होता है जो बड़े पॉजिटिव वे में किया जाता है. इसे ही कहते हैं चाणक्य नीति। वैसे चाणक्य आज होते तो आत्महत्या कर लेते। खैर तीन राज्यों उत्तर प्रदेश, हिमाचल और कर्नाटक में 15 राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव थे. हिमाचल में कांग्रेस के 6 और तीन निर्दलीय भाजपा की तरफ खिसक लिए. मामला टाई हो गया तो फैसला ड्रा निकालकर हुआ. अब जब सत्ताधारी पार्टी के जो 6 विधायक तोड़ सकता है उसके लिए ड्रा अपने पक्ष में करना कौन सा मुश्किल काम है, सो नतीजा भाजपा के पक्ष में गया. कांग्रेस को हार मिली। इस हार ने कांग्रेस के लिए एक और मुसीबत खड़ी कर दी. 40 विधायकों वाली पार्टी 34 की रह गयी क्योंकि कांग्रेस उम्मीदवार को 34 ही वोट मिले, जीतने वाले भाजपा प्रत्याशी को भी 34 वोट मिले हैं तो सवाल उठ रहा है कि बस एक दो विधायकों का और जुगाड़ करना है और हिमाचल की कांग्रेस सरकार धराशायी। गणित बिलकुल साफ़ है, भाजपा नेताओं ने कहना भी शुरू कर दिया है कि सुक्खू सरकार बहुमत खो चुकी है वो अविश्वास प्रस्ताव लाएंगे। बस देखना ये है कि ये अविश्वास प्रस्ताव लोकसभा चुनाव से पहले लाया जायेगा या फिर बाद में. उम्मीद तो यही है कि बाद में क्योंकि सरकार गिराने का काम भाजपा चुनाव जीतने के बाद ही करती है. 2019 में कर्नाटक कैसे भाजपा के पास गया था सबको मालूम है.
चलिए फिर अंतरात्मा पर वापस लौटते हैं। यूपी में सपा के सात विधायकों की एकसाथ अंतरात्मा जगी. अब इसे एक संयोग भी समझ सकते हैं। अगर एक की अंतरात्मा जग सकती है तो एक साथ सात लोगों की क्यों नहीं। सपा के इन सभी विधायकों ने मतदान से पहले यही बात तो कही कि वो अपनी अंतरात्मा की आवाज़ पर मतदान करेंगे। ये अलग बात है कि अन्तरात्मा ने सपा के इन सातों विधायकों से क्या कहा, क्या आवाज़ दी, ये बात सारी दुनिया को पहले ही पता चल गयी. अन्तरात्मा वाकई ऐसी चीज़ है जो मजबूर कर देती है, इसका कोई इलाज नहीं है, अखिलेश को भी कहना पड़ा कि वो किसी की अंतरात्मा के बारे में नहीं जान सकते।
सवाल ये उठता है कि आखिर ये अंतरात्मा चुनाव के मौकों पर ही क्यों जागती है, बाकी सारा समय सोई क्यों रहती है? चुनाव से पहले ही ये अंतरात्मा आवाज़ क्यों देती है और देती भी है तो सिर्फ वोट देने की बात क्यों करती है। ये आवाज़ क्यों नहीं देती कि पहले विधायकी या सांसदी छोड़ो फिर दूसरी पार्टी की तरफ रुख करो. ये अन्तरात्मा ऐसे लोगों से ये सवाल क्यों नहीं करती कि तुम्हें जिस पार्टी के समर्थकों ने वोट देकर जिताया है, जिस पार्टी ने टिकट देकर तुम्हें वोट देने के काबिल बनाया है ये उसके साथ धोखेबाज़ी है. अजीब अंतरात्मा है, ये तो सुविधा भोगी अंतरात्मा है, ये तो राजनीतिक अंतरात्मा है, ये तो अवसरवादी अंतरात्मा है. अंतरात्मा तो बड़ी शुद्ध और पवित्र होती है. अंतरात्मा का तो दूसरा नाम सच्चाई है, तो श्रीमान जी आपसे निवेदन है कि आप अपने राजनीतिक हित साधिये लेकिन क्रॉस वोटिंग के नाम पर अंतरात्मा को बदनाम मत कीजिये।

