तौकीर सिद्दीकी
केंद्र सरकार ने ‘वन नेशन वन इलेक्शन’ के प्लान पर एक कदम आगे बढ़ाते हुए उसे अमलीजामा पहनाने की तैयारी शुरू कर दी है. कमेटी का गठन भी हो चूका है, कमेटी में जो नाम शामिल हैं उनसे सरकार की मंशा भी साफ़ झलक रही है, विपक्ष की तरफ से जो एक नाम कांग्रेस सांसद अधीर रंजन चोधरी का था, वो कांटा भी अब नहीं है क्योंकि कांग्रेस नेता ने कमेटी में शामिल होने से साफ़ इंकार कर दिया है. इस कमेटी की अध्यक्षता पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को सौंपी गई है, ये भी अपने आप में अभूतपूर्व घटना है, ऐसा देश के इतिहास में पहली बार हुआ है जब देश के पूर्व राष्ट्रपति को सरकार ने कोई ज़िम्मेदारी सौंपी हो. वन नेशन वन इलेक्शन की थ्योरी भी ऐसे समय में छेड़ी गयी है जब देश में चुनाव का माहौल है, कई राज्यों के चुनाव बेहद करीब हैं, आम चुनाव भी बहुत दूर नहीं है. इसके अलावा विपक्षी गठबंधन INDIA लगातार मज़बूत होता दिख रहा है, संसद का विशेष सत्र बुलाया जा चूका है. कुल मिलाकर सरकार की नीयत पर संदेह हो रहा है और हर तरफ से यही कहा जा रहा है कि ये सब कुछ सरकार घबराहट में कर रही है. खैर संसद के विशेष सत्र का एजेंडा अभी सामने नहीं आया है, अभी सिर्फ अटकलें लगाईं जा रही हैं.
अब बात जहाँ ‘एक देश-एक चुनाव’ की है तो सबसे बड़ा सवाल यहीं है कि भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश में क्या यह संभव है. ऐसा नहीं है कि पहले की सरकारों में इस पर बात नहीं हुई है, कुछ रिपोर्टें भी आईं लेकिन कभी मामला उससे आगे नहीं बढ़ा. ऐसा भी नहीं कि देश में कभी एक साथ चुनाव नहीं हुए, 1967 तक ‘एक देश-एक चुनाव’ का ही चलन था लेकिन1968 के बाद से ये सिलसिला जो टूटा वो आज तक चला आ रहा है. विधानसभाओं का किसी कारण विघटन होने लगा ,1970 में लोकसभा का भी विघटन हुआ और चुनाव अलग-अलग होने लगे. तब से लेकर अबतक कई बार इसको लेकर कोशिश ज़रूर की गयी, 1983 में चुनाव आयोग की वार्षिक रिपोर्ट में इसकी सम्भावना तलाश की गयी. इसके बाद तीन अन्य रिपोर्ट में इस अवधारणा का गहराई से अध्ययन किया गया.
मई 1999 में न्यायमूर्ति बी पी जीवन रेड्डी की अध्यक्षता वाले विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि हर साल और सत्र के बाहर चुनावों के चक्र को समाप्त किया जाना चाहिए. 2015 में डॉ. ई.एम. सुदर्शन नचियप्पन की अध्यक्षता में कार्मिक, लोक शिकायत, कानून और न्याय के लिए संसदीय स्थायी समिति ने लोकसभा और राज्य विधान सभाओं के लिए एक साथ चुनाव कराने की व्यवहारिकता’ पर अपनी रिपोर्ट सामने रखी. 30 अगस्त, 2018 को न्यायमूर्ति बीएस चौहान की अध्यक्षता वाले विधि आयोग ने एक साथ चुनाव पर अपनी मसौदा रिपोर्ट जारी की जिसमें साफ़ कहा गया कि संविधान के मौजूदा ढांचे के तहत एक साथ चुनाव नहीं कराए जा सकते. इसके लिए संविधान में संशोधन अनिवार्य है.
सरकार कह रही है कि वन नेशन, वन इलेक्शन देश के लिए बेहद ज़रूरी है. पूरे पांच साल कहीं न कहीं चुनाव होने से विकास कार्यों में बाधा आती है, पैसे की बर्बादी होती है.वहीँ राजनीतिक विश्लेषक इस बदलाव को लोकतंत्र के लिए घातक बता रहे हैं। इनका कहना हैं विधानसभा के कार्यकाल को सरकार अपनी मर्ज़ी और सुविधा के हिसाब से घटा या बढ़ा सकती है जिससे उस राज्य का पूरा सिस्टम प्रभावित होगा जहाँ बदलाव होगा। इनका यह भी कहना है कि अगर दोनों चुनाव एक साथ होते हैं तो राष्ट्रीय मुद्दों के सामने क्षेत्रीय मुद्दे गौड़ हो जाएंगे। क्षेत्रीय दलों को इससे नुकसान उठाना पड़ सकता है। ऐसे में वोटर्स द्वारा एक तरफा वोटिंग की आशंका रहेगी जिससे निश्चित तौर पर केंद्र सरकार को फायदा होगा।
फिलहाल तो अभी ये कहा नहीं जा सकता कि वन नेशन, वन इलेक्शन का सरकार द्वारा गठित कमेटी जिसमें उसके ही सारे लोग हैं क्या मसौदा लेकर आती है. यकीनन मोदी सरकार के लिए ये इतना आसान नहीं। सरकार ज़बरदस्ती करना चाहेगी तो मामला अदालत में जायेगा। भारत जैसे देश में जहाँ हर क्षेत्र के अलग मुद्दे हैं, बहुत से राज्यों में क्षेत्रीय दल ही शासन करते हैं तो वो अपने अधिकारों की इतनी आसानी से तिलांजलि नहीं देंगे। सरकार को ये अच्छी तरह मालूम है, उसके सामने चुनाव है और विपक्षी गठबंधन में 28 पार्टियां हैं जिसमें से नेशनल पार्टी के तौर पर सिर्फ कांग्रेस नुमाइंदगी कर रही है. आम आदमी पार्टी को ज़रूर अभी राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिला है लेकिन उसकी मौजूदगी राष्ट्रीय स्तर पर नहीं है तो मोदी सरकार का सामना एक तरह से क्षेत्रीय पार्टियों के गठबंधन से है. कहा जा सकता है कि INDIA गठबंधन ने मोदी सरकार को बेचैन कर रखा है और ‘एक देश-एक चुनाव’ का मुद्दा मोदी सरकार की बेचैनी का सबूत है.

