मेरठ। जिन्होंने पूरे पांच साल भाजपा सरकार की नाक में दम कर रखा था। उनका नाम ओमप्रकाश राजभर हैं। जिन्हें पहले तो तीन—चार साल तक भाजपा मनाती रही और उनके हर नख्ररे बर्दाश्त करती रही। लेकिन जब बहुत हो गया तो भाजपा ने भी इस राजनीतिक में माहिर इस खिलाड़ी से किनारा कर लिया। भाजपा को छोड़कर राजभर ने सपा के साथ अपनी पार्टी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी का गठबंधन किया। ओमप्रकाश राजभर इस बार गाजीपुर की जहूराबाद सीट से सपा और सुहेलदेव पार्टी के गठबंधन से प्रत्याशी हैं। लेकिन यहां पर उनकी मुसीबतें भाजपा और बसपा ने बढ़ा दी है। ओमप्रकाश इस सीट पर त्रिकोणीय मुकाबले में फंसे हुए हैं। राजभर ने खुद के लिए बनारस से ज्यादा सुरक्षित गाजीपुर को माना था लेकिन वो यहां पर त्रिकोणीय मुकाबले में उलझ गए हैं। यहां पर उन्हें शादाब फातिमा और कालीचरन चुनौती दे रहे हैं। पूर्वांचल के राजनैतिक सूरमा माने जाने वाले ओमप्रकाश राजभर के लिए इस बार राह उतनी आसान नहीं दिेखाई दे रही है। ओमप्रकाश जहूराबाद में चौरतरफा घिर गए हैं। एक तरफ बसपा ने सपा की विद्रोही शादाब फातिमा को मैदान में राजभर के खिलाफ उतारा है। 2012 में शादाब सपा से जहूराबाद से जीत चुकी हैं। वहीं भाजपा ने मैदान में कालीचरन राजभर को उतारा है। कालीचरन पूर्व विधायक हैं और वे 2002 और 2007 में लगातार दस साल जनप्रतिनिधि रहे हैं।
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जहूराबाद विधानसभा की इस सियासी जंग में तीन बड़े सूरमाओं के मैदान में आने से मुकाबला काफी दिलचस्प हो गया है। ओमप्रकाश राजभर के लिए अब जातीय समीकरण के लिहाज से जहूराबाद सीट सुरक्षित नहीं रह गई है। जहूराबाद विधानसभा को वोटों के लिहाज से देखे तो यहां पर दलित मतदाताओं की तादात अधिक है। दलित वोटर 75 हजार के आसपास है। वहीं राजभर भी 65 हजार हैं। 45 हजार मतदाता यादव जाति के हैं। जबकि 35 हजार के लगभग चौहान और 30 हजार मुस्लिम, 15 हजार ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या है। यह तो बाद में पता चलेगा कि जहूराबाद का सिकंदर कौन होता है। लेकिन यहां पर लड़ाई वाकई कांटे की है। जातीय समीकरण के लिहाज से तीनों प्रत्याशी एक दूसरे पर भारी पड़ रहे हैं।

