अजय
राजनीति (राज+नीति) यानि शासन और नीति की एक परिभाषा यह भी है कि, उचित समय और उचित स्थान पर उचित कार्य करने की कला। बशर्ते इसका उद्दे्श्य जनहित हो। …लेकिन मोदी-नीति की परिभाषा संभवत: कुछ और है? राजीव गांधाी खेल रत्न पुरुस्कार का नाम बदल कर मेजर ध्यानचंद के नाम किये जाने के निर्णय का संदर्भ लिया जाय तो बात कुछ हजम नहीं हुई? कांग्रेस का विरोध ही कराना था तो खेल की पवित्रता को दांव पर लगाने की क्या आवश्यकता थी भला? सच पूछिये तो मेजर ध्यानचंद के नाम पर लाइफ टाइम एचिवमेंट अवार्ड और स्टेडियम के नाम पहले से हैं। उनके नाम पर किसी नये पुरस्कार की शुरुआत कर मोदी स्टाइल में उसे राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार से बड़ा भी प्रोजेक्ट किया जा सकता था। असल में स्व. राजीव गांधी न केवल देश के पूर्व प्रधानमंत्री थे बल्कि उनकी कुर्बानी देश की खातिर थी। इसको लेकर आम देशवासियों के मन में भावुकता है।
अगर भावुकता है तो इस तर्क पर सवाल उठना स्वाभाविक है कि, लोगों की भावनाओं को देखते हुए पुरस्कार का नाम मेजर ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार किया जा रहा है। गौर हो, प्रधानमंत्री मोदी ने खेल रत्न पुरस्कार के नाम को बदलने की घोषणा करते हुए ट्वीट किया, देश को गर्वित कर देने वाले पलों के बीच अनेक देशवासियों का ये आग्रह भी सामने आया है कि खेल रत्न पुरस्कार का नाम मेजर ध्यानचंद जी को समर्पित किया जाए।
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अगर यह फैसला राजनीति से परे है तो करना यह चाहिये था कि, संसद में बकायदा सर्व-सम्मति से यह निर्णय ही हो जाता कि भविष्य में क्षेत्र विशेष की उपब्धियों के लिए उसी क्षेत्र की पारंगत हस्ती के नाम पर ही योजनाओं, पुरस्कारों, भवनों की घोषणा हो, न कि राजनीतिक हस्तियों के नाम पर। यही
कारण है कि, केंद्रीय खेल मंत्री अनुराग ठाकुर और बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा इसे भले ऐतिहासिक बता रहे हों, लेकिन कांग्रेस से लेकर शिव सेना तक के कई नेता इस फैसले की कड़ी आलोचना कर रहे हैं।
इसे तो कांग्रेस सहित दूसरे अन्य दलों का बड़प्पन ही कहेंगे कि कांग्रेस और अन्य राजनीतिक पार्टियों की तरफ से मेजर ध्यानचंद के नाम पर पुरस्कार देने के फैैसले का तो समर्थन किया गया। हालांकि, इन सभी राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार का नाम बदलने को पूर्व प्रधानमंत्री का अपमान भी बताया। इतना ही नहीं, कई नेताओं ने अहमदाबाद के नरेंद्र मोदी स्टेडियम का नाम बदलने की मांग भी की है।
सोशल मीडिया की बात समझें तो इस फैसले को कई लोग ओलंपिक खिलाड़ी बबीता फोगाट की दी सलाह को वजह मान रहे हैं। फोगाट ने बीते साल राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार का नाम बदलकर किसी खिलाड़ी के नाम पर किए जाने का सुझाव दिया था। सोशल मीडिया फोगाट के बीजेपी में जाने का रास्ता भी साफ मान रहा है।
कांग्रेस का तर्क है कि, मेजर ध्यानचंद जी का नाम अगर भाजपा और पीएम मोदी अपने राजनीतिक उद्देश्यों के लिए न घसीटते तो अच्छा रहता। उनका कहना है कि, राजीव गांधी जी इस देश के नायक थे, नायक रहेंगे। पूर्व पीएम राजीव गांधी इनामों से नहीं, अपनी कुर्बानी, अपने विचारों और देश को कम्प्यूटर युग में लाने वाले आधुनिक भारत के निर्माता के तौर पर जाने जाते हैं। कांग्रेस ने उम्मीद जतायी कि देश के खिलाडयि़ों के नाम पर और ज़्यादा स्टेडियमों और अन्य योजनाओं के नाम रखे जाएंगे। साथ ही नरेंद्र मोदी स्टेडियम और अरुण जेटली स्टेडियम के नाम भी अब बदलेगा। मांग रखी कि, भाजपा नेताओं के नाम से निर्मित स्टेडियम के नाम बदल कर पीटी ऊषा, मिल्खा सिंह, सचिन तेंदुलकर, सुनील गावस्कर, अभिनव बिंद्रा, लिएंडर पेस, पुलेला गोपीचंद और सानिया मिर्जा के नाम पर स्टेडियम के नाम कर दिये जाएं।
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बहरहाल, आरोप लग रहे हैं कि चूंकि, ओलंपिक वर्ष में जब खेल का बजट घटा दिया गया है तो नरेंद्र मोदी जी ध्यान भटकाने का काम कर रहे हैं। कभी किसानों की समस्या तो कभी जासूसी के मामले से और कभी महंगाई से ध्यान भटका रहे हैं। महात्मा गांधी ने एक बार टिप्पणी की थी कि राजनीति ने हमें सांप की कुंडली की तरह जकड़ रखा है और इससे जूझने के सिवाय कोई अन्य रास्ता नहीं है।

