कोई कानून दिमाग में समाई वहशियत और महिलाओं के प्रति हमारी मानसिकता को नहीं बदल सकता
सुनील शर्मा
दिल्ली में हुए निर्भया कांड की पुनरावृत्ति बदायूं में हुई जहां एक पूजा करने गई 50 वर्षीय आंगनबाड़ी सहायिका की गैंगरेप के बाद हत्या कर दी गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में महिला के गुप्तांग में राॅड जैसी कोई चीज डालने का मामला सामने आया था। इस शर्मनाक घटना ने कई सवाल खड़े कर दिये हैं कि आखिर निर्भया के साथ हुई दरिंदगी के बाद बदायूं में हुई हैवानियत के बीच आखिर समाज में क्या बदलाव आया। निर्भया कांड के बाद कानून बने, महिलाओं को सुरक्षा देने के लिये योजनाएं बनायीं गयीं। मिशन शक्ति जैसे अभियान भी चलाये गये और कानून में बदलाव भी लाया गया। मगर कुछ नहीं बदला तो लोगों की वहशियत, औरत को जिस्म के रूप में देखने की मानसिकता, दरिंदगी की शिकार महिला को भी बलात्कार के लिये जिम्मेदार ठहराना, और दरिंदगी की शिकार हुई महिला और उसके साथ हैवानियत करने वाले की जाति-धर्म देखकर बदलने वाली हमारी सोच।
महिला सुरक्षा के नाम पर कानून तो बनाये गये लेकिन उन कानूनों का पालन कराने वाले सिस्टम को बदलने में हर सरकार नाकाम ही रही। यदि सिस्टम सही तरीके से काम करता तो हाथरस में युवती के साथ दरिंदगी करने वालों पर पुलिस मेहरबान न होती। यदि युवती के गंभीर रूप से घायल होने कारण अस्पताल में भर्ती कराये जाने के बाद प्रकरण मीडिया में हाईलाइट न हुआ होता तो दबंग आरोपियों को गिरफ्तार करने की कोशिश भी शायद पुलिस न करती। अब सिस्टम सही होता तो रात के अंधेरे में हाथरस की पीड़िता का अंतिम संस्कार आधी रात को जबरन न किया जाता। सिस्ट काम करता और बदायूं में पुलिस ने त्वरित कार्रवाई की होती तो शायद महिला की जान भी बच सकती थी और तीनों आरोपी मौके से फरार भी न हो पाते। मगर इसे सिस्टम की नाकामी कहा जायेगा कि पुलिस मामले को नजरअंदाज और आरोपियों को बचाने का प्रयास करती रही।
निर्भया प्रकरण के बाद अनेक प्रकार के बयान आये थे कि जवान लड़की को रात में नहीं निकलना चाहिये था। किसी ने जींस-पैंट को बतात्कार करने को प्रेरित करने वाला बताया तो किसी ने चाऊमीन को ही जिम्मेदार ठहरा दिया। निर्भया के बाद बदायूं तक लंबा अरसा गुजर जाने के बाद यदि बलात्कार का शिकार हुई महिला को लेकर लोगों की मानसिकता में बदलाव आया होता तो बदायूं पहुंची राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्य चंद्रमुखी देवी यह न कहती कि अगर वह महिला शाम के समय नहीं जाती या परिवार का कोई बच्चा साथ होता तो शायद ऐसी घटना नहीं होती। लेकिन, उसे फोन करके बुलाया गया था और वह चली गई। यानि बलात्कार की शिकार महिला की गलती निकालने की हमारी मानसिकता में कोई बदलाव नहीं आया। और यह काम यदि खुद एक महिला करे तो कहने के लिये कुछ रह नहीं जाता।
महिलाओं के साथ दरिंदगी होते ही सरकार को जिम्मेदार ठहराने और इस्तीफा तक देने की मांग करने वाले हमारे नेता भी कहां बदले हैं। महिला के साथ बलात्कार होते ही हमारे नेता पहले यह देखते हैं कि बलात्कार की शिकार महिला का धर्म या जाति क्या है। यदि महिला दलित है तो गला फाड़-फाड़कर चिल्लाने और पीड़ित परिवार से मिलने के लिये पुलिस की लाठी खाने को भी वह तैयार रहते हैं। जमीन पर गिरते हैं, रोके जाने पर पुलिस पर आरोप लगाते हैं और पीड़ित परिवार को गले लगाकर आंसू बहाते हैं। खुद को दलित हितैषी साबित करने में हमारे नेता कोई कसर नहीं छोड़ते। मगर यदि बलात्कार पीड़िता दलित नहीं है और उसके साथ दरिंदगी करने वाला भी उसी के धर्म का है तो वहां नेताओं को राजनीतिक लाभ नहीं दिखता। हाथरस मेें जहां पीड़ित परिवार से मिलने से रोका जा रहा था और नेता उनसे मिलने की जिद पर अड़े थे वहीं अब पीड़ित परिवार नेताओं की राह देख रहा है। मगर उनसे मिलने में नेताओं को उतना फायदा मिलता नहीं दिख रहा। इसलिये अखबारों में बयानबाजी की, ट्विटर पर शोक और सरकार के प्रति रोष जता दिया और चुप होकर बैठ गये।
मीडिया भी फिल्म पीपली लाइव की तरह बिकाऊ न्यूज ही कवर करना चाहती है। न्यूज तो बदायूं की भी दिखाई है, अखबारों में भी खबर प्रकाशित हुई है। मगर क्या बदायूं की पीड़िता के दर्द को वो मीडिया कवरेज मिली जो दिल्ली की निर्भया और हाथरस की पीड़िता को दी गयी थी? नहीं, क्योंकि यह मामला हाईप्रोफाइल नहीं बन पाया, बिकाऊ नहीं बन पाया। न इसमें जाति-धर्म का एंगल था, न राजनीतिक दलों या महिला हितैषी कहलाने वाले संगठनों में कोई उबाल था। न कोई रैली निकाल रहा था, न कोई कैंडिल जला कर पीड़िता के लिये न्याय मांग रहा था। उस समय हाथरस की पीड़िता हाॅट न्यूज थी और आज किसानों की खबरें चर्चाओं में है। इसलिये जो बिकता है वहीं न्यूजों में दिखता है।
तो साहब, सिर्फ टसूएं बहाने से, सरकार को दोषी ठहराने से, आरोप लगाने से और पीड़िता को भी बलात्कार के लिये जिम्मेदार ठहराने से कुछ बदलने वाला नहीं है। कोई कानून दिमाग में समाई वहशियत और महिलाओं के प्रति हमारी मानसिकता को नहीं बदल सकता। कोई कानून यह नहीं समझा सकता की बलात्कार की शिकार महिला सिर्फ पीड़िता होती है, वो स्वर्ण, दलित, हिंदू-मुसलमान बाद में होती है पहले वह एक नारी होती है। वह किसी की बहन, किसी की बेटी, किसी की पत्नी और किसी की मां होती है। महिला को जाति-धर्म के चश्मे से देखना छोड़िये, उसके जिस्म को नहीं उसमें छिपी बहन-बेटी को देखिये। दरिंदगी करने वालों की जाति-धर्म देखे बिना उनका सामाजिक बहिष्कार किजिये, उसे सजा दिलाने के लिये आगे आईये। तभी समाज में बदलाव आयेगा और महिलाएं सुरक्षित होंगी। क्योंकि सरकार कितनी भी बदल लो, मानसिकता बदले बिना कुछ बदलने वाला नहीं है।

