क़ुतुब मीनार मामले में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने दिल्ली के साकेत कोर्ट में हलफनामा दायर कर कहा है कि कुतुबमीनार 1914 से एक संरक्षित ईमारत है इसलिए इस स्मारक में न अब पूजा पाठ की अनुमति दी जा सकती है और न ही इसकी पहचान को बदला जा सकता है, ASI का यह भी दावा है कि 1914 से यहाँ कभी पूजा अर्चना नहीं हुई, वहीँ क़ुतुब मीनार के मस्जिद के पेश इमाम का दावा है कि ASI ने कुतुबमीनार की मस्जिद में नमाज पढ़ने पर पाबन्दी लगा दी है।
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दरअसल साकेत कोर्ट में एक याचिका दाखिल की गयी है कि क़ुतुब मीनार परिसर में रखी हुई देवी देवताओं की मूर्तियों का सही स्थान पर रखा गया है, दावा है कि कुतुबमीनार परिसर में बड़ी संख्या में हिन्दू देवी देवताओं की मूर्तियों की मौजूदगी साबित करती है कि क़ुतुब मीनार तोड़कर बनाया गया है। हिन्दू संगठन कुतुबमीनार को विष्णु स्तम्भ कहते हैं।
ASI का कहना है कि वर्तमान में किसी को भी पूजा का अधिकार नहीं है इसलिए हिन्दू का कानूनी दावा वैध नहीं है। ASI ने अपने हलफनामे कहा कि संरक्षित ईमारत का इस्तेमाल सिर्फ पर्यटन के लिए किया जा सकता है न कि किसी धार्मिक प्रयोग के लिए वहीँ कुतुबमीनार मस्जिद के इमाम का कहना है कि पिछली 13 मई को ASI की टीम मस्जिद में नमाज़ पढ़ने से रोक लगा दी है जबकि ASI का कहना है कि 2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स के समय नमाज़ पर पाबन्दी लगाई गयी थी क्योंकि नमाज़ियों के पास ASI का कोई अनुमति पत्र नहीं था।
जानकारी के मुताबिक अगले कई सालों तक मस्जिद में नमाज़ नहीं हुई, फिर 2016 से यहाँ दो चार लोगों द्वारा दोबारा नमाज़ पढ़ने का सिलसिला शुरू हुआ जो बढ़ते बढ़ते तीस चालीस नमाज़ियों तक जा पहुंचा। वहीँ हिन्दू पक्ष का दावा है कि ASI की रिपोर्ट खुद बताती है कि कुतुबुद्दीन ऐबक ने 27 मंदिरों को तोडा था और क़ुतुब मीनार को खड़ा किया गया था। याचिकाकर्ता हरिशंकर जैन के मुताबिक हमारे पास जिसटने भी सबूत हैं सब ASI के दस्तावेज़ हैं।

