इबादतगाहों को बचाने की बेचैनी

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अमित बिश्‍नोई

वैसे तो देश में धर्म से जुड़े विवादों का पुराना नाता है, आज़ादी से पहले भी और आज़ादी के बाद भी. बाबरी मस्जिद-श्रीराम जन्मस्थली इसकी सबसे बड़ी मिसाल है. दशकों मुकदमा चला, बाबरी मस्जिद का विध्वंस भी हुआ, देश दंगों की आग में भी जला, राम लला को बरसों टेंट और त्रिपाल में रहना पड़ा अंत में सुप्रीम कोर्ट के दखल से यह फैसला हो गया कि वहां पर राम मंदिर ही बनेगा, हालाँकि इस बात से इंकार भी किया गया कि मंदिर तोड़कर मस्जिद बनी थी. मस्जिद के लिए अलग ज़मीन दे दी गयी, राम मंदिर का निर्माण भी होने लगा. फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि केस एक अपवाद है।  आगे इस तरह के किसी और विवाद में धर्मस्थलों के स्वरुप में 1991 में बना प्लेसेस ऑफ़ वरशिप एक्ट ही लागू होगा। लेकिन इसके बावजूद आजकल देश में जहाँ ज्ञानवापी मस्जिद और श्रीकृष्ण जन्मस्थान और ईदगाह विवाद अदालतों में हैं वहीँ दूसरी अन्य मस्जिदें और मुग़लकालीन ऐतिहासिक इमारतें विवादित की जा रहीं हैं. इन हालात में मुस्लिम संगठनों का क्या रुख है चर्चा आज इसपर है.

बाबरी मस्जिद का मामला दशकों अदालत में चला, मुस्लिम पर्सनल बोर्ड की निगरानी में बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी ने उसकी पैरवी की लेकिन मुस्लिम पक्ष को जो नतीजा मिला उससे वह यकीनन संतुष्ट नहीं रहा मगर देश की सर्वोच्च अदालत का निर्णय मानना उनकी मजबूरी थी. बहरहाल उस मुकदमेबाज़ी से मुस्लिम तंज़ीमों ने काफी कुछ सबक हासिल किया है. और इस बार वह मिली हुई सीख के हिसाब से अपने धर्मस्थलों की रक्षा की रणनीति तैयार कर रहे हैं. AIMPLB हो, मजलिसे मुशावरत हो या फिर जमीअतुल उल्माए हिन्द, सभी संगठन इस बात में एक राय हैं कि इस समस्या का सामना सिर्फ अदालत के ज़रिये किया जाय न कि सड़कों पर उतरकर। 

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Gyanvapi Mosque

दो दिन पहले लखनऊ में इस सिलसिले में हुई आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल बोर्ड की वर्चुअली मीटिंग में यही बात कही गयी कि अपनी इबादतगाहों को बचाने के लिए बेहतर कानूनी लड़ाई ही सबसे कारगर क़दम है, साथ ही मुस्लिम नौजवानों से यह अपील भी की गयी कि इन मामलों में किसी भी तरह की उत्तेजना न फैलाइए। अपील तो टीवी पर बहसों में शामिल होने वाले उन तथाकथित मौलानाओं और मुस्लिम बुद्धिजीवियों से भी की गयी कि वह टीवी की इन डिबेट्स से दूर रहें, वैसे यह सभी जानते हैं कि यह टीवी डिबेट्स प्रायोजित होती हैं और कुछ पैसे लेकर इनसे कुछ भी बुलवाया जा सकता है. बोर्ड की सबसे बड़ी चिंता यह हैं कि एक कानून होने के बावजूद अदालतें इस तरह के आदेश दे रही हैं जो कानून के खिलाफ है और अदालत के ऐसे ही आदेशों से मुस्लिम समुदाय चिंतित है. बोर्ड को सबसे ज़्यादा हैरानी इस बात की है कि इन सारी घटनाओं पर प्रधानमंत्री मोदी ने चुप्पी साध रखी है जो और भी बड़ी चिंता का विषय है. 

वहीँ कल यानि 28 मई को जमीअतुल उल्माए हिन्द (महमूद मदनी गुट) मौजूदा समस्याओं पर दो दिवसीय कांफेरेंस का आयोजन कर रहा है जिसमें जानकारी के अनुसार देश भर के ओलेमा और मुस्लिम दानिश्वरों के अलावा संगठन के हज़ारों लोग शामिल होंगे। इस बैठक का एजेंडा भी वही है कि मौजूदा हालत में जो धार्मिक चुनौतियां सामने आयी हैं उनका सामना किस तरह से किया जाय, संगठन का यह भी मानना है कि यह सिर्फ धार्मिक चुनौतियां ही नहीं इनके साथ राजनीतिक और सामाजिक चुनौतियां भी जुडी हुई हैं. कल और परसों जमीअत मंथन करेगी, क्या निकलेगा यह 29 मई को ही सामने आएगा। दूसरी तरफ जमीअत का सबसे बड़ा अरशद मदनी गुट भी कानूनी लड़ाई की बात कह चूका है. जमीअत उल्माए हिन्द का अरशद मदनी गुट मुसलमान से जुड़े मुकदमों की लगातार पैरवी करता आ रहा है. 

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इधर बरेली मसलक के मौलाना तौकीर रज़ा जैसे लोग भी हैं जो इन विवादों को सड़कों पर लाना चाहते हैं और लगातार ऐसे बयान देते रहते हैं जिससे उत्तेजना फैले, वहीँ AIMIM प्रमुख भले ही पर्सनल बोर्ड के सदस्य हैं मगर बयान भी काफी विवादित देते रहते हैं जिसमें राजनीति का रंग ज़्यादा रहता है. इन सबके बीच बुनकरों के मसीहा माने जाने वाले मोमिन अंसार सभा के अकरम अंसारी इन सारी मुस्लिम तंज़ीमों से एक प्लेटफार्म पर आने की अपील करते हैं, उनका कहना है कि वक्त का तकाज़ा है कि इस गंभीर मसले पर सब लोग एकसाथ आएं और एक ही आवाज़ उठायें। बहरहाल मामला अदालत में चल रहा है, बहस इस बात की है कि मुक़दमे की सुनवाई हो या न हो लेकिन मुस्लिम संगठनों में बेचैनी तो बढ़ी ही है.

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