अमित बिश्नोई
शाद लखनवी के मशहूर शेर की एक लाइन है “मर्ज़ बढ़ता गया जूँ जूँ दवा की”. कांग्रेस पार्टी के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है, विशेषकर गुजरात में जहाँ कुछ ही महीनों बाद चुनाव होने वाले हैं और कांग्रेस पार्टी यहाँ 27 सालों से वनवास काट रही है. शायर की इस पंक्ति पर बात कहने को तो बहुत सी है लेकिन ताज़ा एपिसोड पाटीदार समुदाय के नेता और गुजरात कांग्रेस के कार्यवाहक अध्यक्ष रहे हार्दिक पटेल के हवाले से है जिन्होंने पिछले दो महीने से राज्य से लेकर दिल्ली तक के नेताओं का जीना हराम कर दिया था, कांग्रेस पार्टी इस मर्ज़ (हार्दिक) के इलाज की लाख कोशिश करती रही मगर ज़ख्म था जो बढ़ते बढ़ते फोड़ा बन गया और आखिरकार फूट ही पड़ा।
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आपको याद होगा कि कांग्रेस पार्टी ने राजस्थान के उदयपुर में चिंतिन शिविर लगाया था और उसमें हार्दिक जैसी कई चिंताओं पर चिंतन किया गया था, पार्टी को मज़बूत और संगठित करने के उपाय सुझाए गए थे, सबसे बड़ी बात 50 below 50 की बात कही गयी थी, बल्कि नौजवानों की पार्टी में और ज़्यादा भूमिका देने पर ज़ोर दिया गया था, बता दें कि हार्दिक पटेल अभी 30 वर्ष के भी नहीं हुए हैं मतलब अभी जोश है पर अनुभव नहीं जो राजनीति के लिए बेहद ज़रूरी होता है। खैर इस नव संकल्प शिविर में कांग्रेस ने जोड़ो जोड़ो भारत जोड़ो का नारा दिया था मगर यह क्या सिर मुंडाते ही ओले पड़े. पहले चिंतन शिविर के दौरान ही एक पुश्तैनी कांग्रेसी जाट नेता दक्षिणपंथी बन गया और उसके बाद हार्दिक का ह्रदय तोड़ने वाला इस्तीफ़ा। इन दोनों इस्तीफों से कांग्रेस का भारत जोड़ो नारा ही खतरे में पड़ गया. जब पार्टी अपने नेताओं को ही नहीं जोड़ पा रही है तो पूरे देश को कैसे जोड़ेगी?
गुजरात कांग्रेस में भगदड़ तो पिछले दो साल से मची हुई थी, इस बीच एक दर्जन से ज़्यादा पूर्व और मौजूदा विधायक कांग्रेसी विचारधारा को त्याग कर दक्षिणपंथी विचारधारा में शामिल हो गए या ऐसा भी कह सकते हैं सुखभोगी कांग्रेसी नेता सत्ता का सुख लेने के लिए हाथ का साथ छोड़ बैठे। कांग्रेस पार्टी से इस्तीफ़ा देने पर अब इस पार्टी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता क्योंकि पिछले आठ वर्षों में कांग्रेस पार्टी ने इतने इस्तीफे देखे हैं कि एक नई पार्टी खड़ी हो जाय. अब तो अगर किसी सांसद, विधायक या नेता के इस्तीफे की बात सुनाई देती है तो पहले ध्यान इसी तरफ जाता है कि कोई कांग्रेसी ही होगा जो भाजपाई हो गया।
लेकिन हार्दिक पटेल ने इस्तीफ़ा देते समय लिखित में जो आरोप कांग्रेस पार्टी और उसके शीर्ष नेतृत्व लगाए उस तरह के आरोप कम ही लोग लगाते हैं. आम तौर पर विचारधारा से भटकने, दम घुटने या आदर्शों को त्यागने की बात लोग पार्टी छोड़ते समय करते हैं लेकिन हार्दिक ने तो बहुत गंभीर आरोप लगाए, सबसे बड़ा आरोप तो गुजरात विरोधी होने का लगा दिया, शायद यही वजह रही कि हार्दिक के जिगरी दोस्त जिग्नेश मेवाणी को भी एक गुजरती होने के नाते बहुत बुरा लगा और उन्होंने अपने मित्र को ज़बरदस्त लताड़ लगा दी, जिग्नेश ने गिनवा दिया कि कांग्रेस ने उनको क्या क्या दिया, कांग्रेस के इतिहास का सबसे कम उम्र अध्यक्ष उन्हें बनाया। जिग्नेश ने सबसे बड़ी बात तो यह कही कि हार्दिक क्या चाहते थे कि एक दिन में ही उनको सबकुछ मिल जाय. यह बात जिग्नेश ने शायद हार्दिक की उस बात पर कही थी कि कांग्रेस में मेरे तीन साल बर्बाद हो गए।
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दरअसल हार्दिक को यह भी गुमान था कि कांग्रेस पार्टी के लिए वही एक ऐसे नेता हैं जो पाटीदार समुदाय पर पकड़ रखते हैं और कांग्रेस पार्टी को उनकी हर बात इसीलिए माननी चाहिए, जो कांग्रेस के अंदर तो संभव ही नहीं। खैर हार्दिक के तीन साल बर्बाद हुए या नहीं इसपर अब बहस बेकार है, देखने वाली बात यह है कि अब वह आबाद होने के लिए कहाँ जाने वाले हैं, उनके बयानों से तो ऐसा लगता है कि वह दोराहे पर खड़े हैं और फैसला नहीं ले पा रहे हैं कि कौन सी राह पकड़ें जिसपर चलने से उनके बर्बाद हुए तीन सालों की भरपाई हो सके. देखना यह है कि कांग्रेस पार्टी गुजरात में हार्दिक की भरपाई अब किससे करेगी? अगर पिछले एक दो महीनों के कांग्रेस पार्टी में चल रहे डेवलॅपमेंट को देखें तो आपको साफ़ नज़र आ जायेगा कि गुजरात कांग्रेस में जिग्नेश का क़द बढ़ रहा है. लेकिन यह बढ़ता क़द कब बढ़ना रुक जाय या बढ़ते क़द को छांट दिया जाय कुछ कहा नहीं जा सकता क्योंकि यह कांग्रेस पार्टी है!

