अमित बिश्नोई
घर के मुखिया का दुनिया छोड़ना परिवार के लिए पहाड़ टूटने जैसा होता है, मुलायम सिंह यादव परिवार और पार्टी के लिए पहाड़ की हैसियत ही रखते थे. अब इस टूटते पहाड़ को रोकना उनके उत्तराधिकारी अखिलेश यादव के लिए सबसे बड़ी परीक्षा होगी। परिवार का मुखिया भले ही खटिया पर घर के एक कोने में पड़ा रहता है मगर उसका भरम कायम रहता है, उसने अपने जीवन में जो नाम और शोहरत कमाई होती है वो उस घर और घर वालों के साथ उसके मरने तक जुडी रहती है लेकिन उसके जीवन छोड़ते ही वो भरम भरभरा जाता है, उस भरम को बरकरार रखना बड़ा मुश्किल होता है. परिवार का अगला मुखिया अगर लायक है तो वो उस भरम को बरकरार रखता पाता नहीं तो अपनी पहचान बनाने के लिए वो उस भरम को खुद तोड़ देता है. यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि नए मुखिया की ज़रूरतें क्या हैं, मकसद क्या है, बात चूंकि राजनीतिक परिवार की है तो यह भरम और भी भारी हो जाता है, महत्वपूर्ण हो जाता है. मुलायम सिंह के बाद अब अखिलेश को यह तय करना है कि वो बाप के भरम को कायम रखेंगे या परिवार और पार्टी को अपने ही तरीके से चलाएंगे।
बात कड़वी है मगर बिलकुल सच है, पिता के पुत्र मोह से उनको राजगद्दी तो मिल गयी मगर राज कैसे किया जाता है और अपने साम्राज्य को कैसे बचाकर रखा जाता है ये अखिलेश अपने पिता से नहीं सीख सके. पिता तो ज़मीन से उठकर आसमान तक गए, तीन बार मुख्यमंत्री रहे, देश के रक्षा मंत्री बने, अगर अपनों ने दगा न की होती तो उससे पहले देश के प्रधानमंत्री भी बन गए होते। मगर अखिलेश को पिता ने सजी सजाई जो राजगद्दी सौंपी, अखिलेश उस पर बैठने के तौर तरीके न सीख सके, राज दरबार में किसकी क्या हैसियत होती है यह वो न सीख सके. नतीजे में राजपाट छिन गया और उसके बाद उसे दोबारा हासिल करने की जितनी भी छोटी बड़ी जंग उन्होंने लड़ी लगातार पराजय मिलती गयी. मुलायम पहलवान थे, दंगल में धरती पर गिरने के बाद भी कैसे धोबी पछाड़ के सहारे वापसी की जाती है उन्हें बखूबी आता था मगर सिडनी यूनिवर्सिटी के डिग्री होल्डर अखिलेश अपने पिता से वो कला नहीं सीख सके.
मुलायम ने मरते दम तक मतभेदों और मनभेदों के बावजूद परिवार को एक धागे में पिरोये रखा, पार्टी को पिरोये रखने की कोशिश करते रहे. अपने पिता को राजनीतिक एकांतवास में भेजने के बावजूद अखिलेश को उनकी ज़रुरत पड़ती थी, पार्टी में उनकी अहमियत का एहसास होता था और इसीलिए कार्यकर्ताओं में जोश भरने के लिए हमेशा उनका सहारा लेना पड़ता था, बीमारी की बावजूद उन्हें पार्टी के लोगों के सामने लाना पड़ता था, चुनावी मंच पर ले जाना पड़ता था. अखिलेश को यह अच्छी तरह मालूम था कि नेता जी की पार्टी में लोकप्रियता आज भी उनसे ज़्यादा है. लोग आज भी धरतीपुत्र से अथाह प्रेम करते हैं. विरोधी भी उनके सम्मान में सर झुकाते हैं. लेकिन बड़ा सवाल यही है कि अब मुलायम के बिना अखिलेश की क्या हैसियत होगी?
बेशक वो पार्टी के मुखिया हैं और आगे भी बने रहेंगे लेकिन क्या नेता जी के सम्मान में, उनका लिहाज़ करके परिवार या पार्टी में जो लोग बोलने से बचते रहते थे, अब मुखर नहीं होंगे। क्या विरासत की जंग फिर नहीं उभरेगी? क्या चाचा शिवपाल का अब नया रूप देखने को नहीं मिल सकता है? क्या परिवार में कोई और शिवपाल नहीं पैदा हो सकता है? अखिलेश के लिए आगे की डगर बहुत कठिन होने वाली है, उनकी अबतक की राजनीतिक कार्यशैली तो यही कहानी कह रही है. उन्हें विरोधियों को साधना नहीं दबाना आता है, गठबंधन का क ख ग भी उन्हें नहीं मालूम, यही वजह है कि हर बार उन्हें नाकामी मिली है और पार्टी को नुकसान। मुलायम जहाँ दूरअंदेशी से काम लेते रहे और कामयाब होते रहे वहीँ उनके सुपुत्र सामयिक लाभ में अबतक विश्वास करते नज़र आये हैं और नाकाम होते हुए भी. धरतीपुत्र तो अब धरती से चला गया और अपनी विरासत को ऐसे हाथों में सौंप गया जिसने अबतक उन्हें, परिवार और पार्टी को निराश किया। अब जबकि वो इस दुनिया में नहीं हैं तो क्या अखिलेश में कोई बदलाव दिखेगा? क्या मुलायम की तरह अखिलेश सबको अपने साथ एकजुट रख पाएंगे? देखना होगा कि मुलायम बिना अब अखिलेश का क्या होगा? संभल गए तो अच्छा वर्ना बुरा तो हो ही रहा है.

