MLC Chunav 2022: इस हार को मैं क्या नाम दूँ?

आर्टिकल/इंटरव्यूMLC Chunav 2022: इस हार को मैं क्या नाम दूँ?

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अमित बिश्‍नोई

समाजवादी पार्टी के गृह नक्षत्र इन दिनों अच्छे नहीं चल रहे हैं, हर तरफ से सिर्फ बुरी खबरें ही आ रही हैं. अभी सगे चाचा शिवपाल और मुंह बोले चच्चा आज़म खान के खेमे से बग़ावत की बातें फैलना शुरू ही हुई थीं कि प्रदेश के एमएलसी चुनाव में सूपड़ा साफ़ होने की खबर ने पूरी तरह से पार्टी की मिटटी पलीद कर दी।  इन चुनावों में साइकिल पंक्चर ही नहीं हुई बल्कि पूरी साइकिल के अंजर पंजर बिखर गए।  जवानी क़ुर्बान करने वाली इस पार्टी की ऐसी दुर्गति होगी, ऐसा तो किसी ने भी नहीं सोचा था।  इनसे अच्छे तो दो बाहुबली और एक बाग़ी निकले जिन्होंने भाजपा को क्लीन स्वीप करने से रोक दिया। समझ में नहीं आता कि इस हार को मैं क्या नाम दूँ , बुल्डोज़र या कुछ और ?

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माना कि एमएलसी चुनाव में सत्ता रूढ़ दल की चलती है, मगर विपक्ष ऐसा लुंज पुंज कभी नहीं हुआ, बिहार में कांग्रेस ने एमएलसी चुनाव में अपने एक उम्मीदवार को जितवा दिया। आप तो प्रदेश में वह मुख्य विपक्षी दल हो जिनके एक सौ ग्यारह विधायक हैं क्या इनकी इतनी भी औक़ात नहीं कि यह एक एमएलसी सीट पार्टी को दिलवा सकें। अब हमेशा की तरह धांधली का रोना शुरू होगा, बेशक हुई होगी धांधली, इन चुनावों में कब नहीं होती धांधली, आपके समय में भी खूब हुई तब भाजपा और बसपा चिल्ला रहे थे. वजह कुछ भी कहिये पर अखिलेश के लिए यह किसी शर्मनाक घटना से कम नहीं। 

इन नतीजों ने कहीं न कहीं साबित कर दिया है कि पार्टी के अंदर सबकुछ ठीक नहीं, ढोल में पोल वाली कहावत लागू होती है। अपने गढ़ वाली सीटों पर भी सपा की बुरी हालत हुई, आजमगढ़ में तो तीसरे नंबर रही। यहाँ से तो भाजपा के बाग़ी ने बाज़ी मार ली. समाजवादी पार्टी के लिए इन चुनावों के नतीजों ने अखिलेश यादव पर सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। विधानसभा चुनावों में अनुकूल परिस्थितियों को न भुना पाने और अब एमएलसी चुनाव में सूपड़ा साफ़ होने से साबित हो गया कि दुश्मन भले ही मज़बूत था लेकिन जंग लड़ने का हुनर आपको नहीं आता. विधानसभा चुनावों में गलत टिकट वितरण की बातें सामने आयी थीं वहीँ इन चुनावों में भी यादवों की वर्चस्वता से पार्टी के अंदर बेचैनी थी। 

बरसों से पार्टी के लिए खून, पसीना और पैसा न्योछावर करने वाले पार्टी नेताओं का एक ही सवाल कि हम कब तक आपके लिए दरी बिछाएंगे, कब तक आपके मंच सजायेंगे, कब तक आपके जयकारे के लिए भीड़ को बुलाएँगे, कब तक आपके लोगों को जिताएंगे और ताली बजायेंगे। इन चुनावी नतीजों ने साबित कर दिया कि लोगों ने पार्टी को छोड़ अवसर को अपनाया, जहाँ जो मिल सका उसे हासिल किया क्योंकि वह अपने नेता से निराश हैं  और इसका खुलकर इज़हार भी कर रहे हैं। सोशल प्लेटफॉर्म पर अपने समर्थकों द्वारा खुले आम पार्टी नेतृत्व पर भेदभाव के आरोप लगाए जा रहे हैं। 

अखिलेश हार की खीज अब पार्टी कार्यकर्ताओं पर निकाल रहे हैं, बाराबंकी के कई कर्मठ कार्यकर्ताओं को 6 साल के लिए पार्टी से निष्काषित कर दिया। अखिलेश को समझना होगा कि कार्यकर्ता को हटाना बहुत आसान होता मगर जोड़ना बड़ा मुश्किल होता है, और फिर आज की राजनीति में हर व्यक्ति संभावनाओं को देखता है, इस तरह के चुनावी नतीजे हौसला तोड़ते हैं और कार्यकर्ताओं के हौसले टूटने से पार्टी के हौसले भी टूटते हैं। 

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समाजवादी पार्टी के लिए 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव एक टेढ़ी खीर साबित होने वाले हैं , मृदुलभाषी अखिलेश यादव के व्यवहार और भाषा में दम्भ की झलक दिखने लगी है जो लगातार मिल रही नाकामियों से और बढ़ती जा रही है।  समय रहते अगर सपा मुखिया ने अगर अपनी नकारात्मकता पर काबू नहीं पाया तो जनता विकल्प तलाशने में अब देर नहीं करती।

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