अमित बिश्नोई
देश में आज से नए वित्त वर्ष की शुरुआत हो रही है और इस नए वित्त वर्ष को यादगार बनाने के लिए सरकार जहाँ आज से टोल टैक्स को बढ़ा रही है वहीँ पिछले 10 दिनों में पेट्रोल डीज़ल (Petrol Diesel) पर 6 रूपये से ज़्यादा बढ़ा चुकी है मगर आज कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर के दाम में एक मुश्त 250 रूपये का इज़ाफ़ा करके उसने आम आदमी को जो ज़ोरदार झटका दिया है उससे वह बिलबिला उठा है. इससे पहले घरेलू एलपीजी के दाम में 50 रूपये का इज़ाफ़ा करके सरकार गृहणियों के किचन बजट को और बिगाड़ चुकी है।
कमर्शियल एलपीजी के दाम में इस लम्बे इज़ाफ़े का सीधा असर आम जनता पर पड़ने वाला है और हर वह चीज़ महंगी होने वाली है जिसमें कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर (LPG Cylinder) का इस्तेमाल होता है, फिर वह चाहे हमारे प्रिय प्रधानमंत्री मोदी जी का पसंदीदा व्यंजन पकोड़े हों या फिर फेवरिट ड्रिंक चाय हो या फिर आम जनता के मनपसंद स्वादिष्ट समोसे हों, पूरी सब्ज़ी हो या फिर छोले भटूरे, सबके दामों में आग लगना ज़रूरी हो गया है।
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1 मार्च को यह कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर 2012 रुपए में आता था, 22 मार्च को इसमें 9 रूपये की कमी गयी और ठीक 10 बाद इसमें साढ़े बारह प्रतिशत यानि 250 रूपये का इज़ाफ़ा। कोलकाता में तो यह इज़ाफ़ा 250 रूपये से भी ज़्यादा है. 9 रूपये घटाकर 250 रूपये बढ़ाना तो बिलकुल वैसा ही जैसे शेर किसी कमज़ोर जानवर पर हमला करने से पहले दो क़दम पीछे लेता है. एक गाने की लाइन है “ज़ोर का झटका हाय धीरे से लगा”, मगर यहाँ धीरे से नहीं बल्कि
ज़ोर का झटका ज़ोर से मारा गया है और इतनी ज़ोर से मारा गया है कि हर आदमी कराह उठा है, यह अलग बात है भक्ताई के इस दौर में मार खाने के बाद भी लोगों के मुंह से उफ़ तक नहीं निकलती भले दर्द ज़ोर का हो रहा हो.
आज देश में मंहगाई को राष्ट्रवाद से जोड़ दिया गया है. आपने मंहगाई पर एक सवाल उठाया कि आपके ऊपर सौ सवाल दाग़ दिए जायेंगे। आपको लगने लगेगा कि मंहगाई पर बोलकर आपने कोई पाप कर दिया, अगर आप सोशल मीडिया पर हैं तो ट्रोलर्स आपको हीन भावना का शिकार बना देंगे, आपको मजबूर कर देंगे कि आप थियेटर में जाकर कश्मीर पर बनी फिल्म देखें, भले ही आपको फिल्मों से कोई दिलचस्पी हो या न हो. आपको राष्ट्रविरोधी साबित करने में यह ज़रा भी देर नहीं लगाएंगे।
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मुझे याद आते हैं 2014 के वह नज़ारे जब एक महिला नेता जिन्हे लोग तुलसी भाभी के नाम से जानते थे, गैस सिलेंडर से चिपककर रुदन करती हुई नज़र आती थी, मार्गदर्शक मंडल में फेंक दिए गए आडवाणी जी भी गले में गैस सिलेंडर का पोस्टर लटकाये सड़कों पर घुमते थे तब सवा चार सौ रूपये का घरेलू एलपीजी सिलेंडर हुआ करता था. अब अडवाणी जी पर क्या कहें वह वैसे ही अब बेचारे हो चुके हैं लेकिन तुलसी भाभी आज केंद्र की सत्ता में हैं लेकिन अब उनका वो रुदाली वाला रूप दिखाई नहीं दे रहा है. मंहगाई अब इनके लिए बीमारी नहीं है, इसलिए सरकार इसका इलाज क्यों करे? किसी ने मंहगाई पर बहुत बढ़िया वन लाइनर लिखी है “हमें मंहगाई से लड़ना सरकार से नहीं।
सरकार का भी यही मानना है कि हमसे लड़कर तुम्हें क्या मिलने वाला, उलटे नुकसान ही उठाओगे, इसलिए मंहगाई मंहगाई ज़रूर चिल्लाओ मगर उसे सरकार से मत जोड़ो। सरकार के मुताबिक मंहगाई तो अमरलता है, जिसका काम सिर्फ बढ़ना है. इसलिए मंहगाई पर ज़्यादा उछलकूद मत मचाओ और राष्ट्रवाद के कामों में हाथ बटाओ। सरकार के पास और भी बहुत से काम हैं जो इन सबसे ज़्यादा ज़रूरी हैं. आने वाले महीनों में कई राज्यों के चुनाव हैं जहाँ उसे राष्ट्रवाद की ज़मीन तैयार करनी है. कर्नाटक से शुरुआत हो चुकी है, अभी अन्य राज्यों में राष्ट्रवाद फैलाने जाना है.
आखिर में जनता जनार्दन से एक ही बात कि “आपको मंहगाई से लड़ना है सरकार से नहीं” क्योंकि यह सब बातें बेमानी हो चुकी हैं। भूल जाइये कि कभी प्याज़ के दाम बढ़ने पर सरकारें गिर जाती थी क्योंकि पेट्रोल-डीज़ल हो, एलपीजी सिलेंडर हो या नून तेल रोटी सबपर राष्ट्रवाद का मुलम्मा चढ़ा दिया गया है इसलिए राष्ट्र से अगर आपको है प्यार तो मंहगाई से क्यों इंकार।

