- नवेद शिकोह

कुछ चीज़े ख़ुद ब ख़ुद हो जाती हैं। पिछले चंद घंटों में ये बात स्पष्ट हो गई कि देश के सबसे विशाल मध्यम वर्ग की बड़ी आबादी अपनी जमा-पूंजी और सरकारी बैंकों की छोटी बचत योजनाओं के सहारे गुजारा कर रही है। बुधवार की रात जब सरकार ने छोटी बचत योजनाओं के ब्याज की कटौती का एलान किया तो पब्लिक में निराशा की लहर दौड़ गई। कई राज्यों में चुनाव हैं और भाजपा का शीर्ष नेतृत्व जब पश्चिम बंगाल के चुनावी अखाड़े में हर दांव-पेंच आजमा रहा है वहीं बचत योजनाओं में ब्याज दरों को ऐसे चुनावों के दिनों कम करके आम जनता को निराश करना बड़ी हिमाकत जैसा फैसला था। सरकार ने रात की इस भूल को सुबह सुधार लिया। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सुबह ही एक ट्वीट कर अपने मंत्रालय का ही फैसला पलट दिया और कहा कहा कि ये एक भूल थी। हांलाकि इसपर विपक्षी दलों और आम जनता ने सोशल मीडिया पर वित्त मंत्री का खूब मजाक भी उड़ाया।
दरअसल देश के तमाम सूबों की तरह पश्चिम बंगाल में एक बड़ी बुजुर्ग आबादी अपनी बचत पूंजी के ब्याज के सहारे गुजर बसर करती है। लखनऊ की ही बात कीजिए तो यहां भी ब्याज कटौती की खबर से लोग नाराज थे। बक़ौल 74 वर्षीय लखनऊ निवासी सुतापा उनके स्वर्गीय पति की सेविंग का ब्याज ही जिन्दा रखे है। एक वक्त की रोटी का इंतजाम तो हो ही जाता है, ब्याज और कम हो गया तो एक वक्त की रोटी का सहारा भी नहीं बचेगा। वो बताती हैं कि बच्चों की पढ़ाई पूरी हो चुकी। नौकरी नहीं मिल रही। एक को कारोबार में लगाया, काम नहीं चला। नुकसान भी बहुत हो गया। दोनों लड़कियां नौकरी की तलाश मे लगी हैं। सुतापा बताती हैं कि बेटियों के पिता जी के जीवन भर की सेविंग को बचत योजनाओं में लगाया है और इसके ब्याज पर ही मेरा और बेटियों का पेट भरता है।

शायद सरकार को सुतापा जैसों लाखों बुजुर्गों के बारे में ज्यादा कुछ नहीं मालूम था।
एक भूल के पीछे कई भूलों का हाथ होता है और हर भूल बहुत कुछ सिखाती है, बताती है, सबक होती है और नहीसत देती है। अपने जीवन भर की खून-पसीने और ईमानदारी की बचत के जरिए मामूली ब्याज की रकम से ग़ुज़ारा करने वाले करोड़ों लोगों को डराने वाला सरकार का फैसला एक भूल थी। लक्ष्मण रेखा पार करने की भूल की तरह वित्त मंत्री सीता रमण के मंत्रालय की बचत योजनाओं के ब्याज की कटौती वाले फैसले की भूल भी एक बड़ा फलसफा बना कर गई। कई सवाल खड़े कर गई। कई नसीहतें भी दे गई। मसलन क्या वित्त मंत्रालय के फैसलों से वित्त मंत्री को अलग रखा जाता है ?
या वित्त मंत्री को पहले इस बात का एहसास नहीं था कि बचत योजनाओं में ब्याज दरों की और ज्यादा कटौती आम इंसान को झंकझोर देगी। ये हो सकता है कि शायद उन्हें आम लोगों के जीवन यापन का अंदाजा ना हो। जैसा कि वो खुद कह चुकी हैं कि प्याज-लहसुन वो नहीं खातीं इसलिए बतौर वित्त मंत्री भी उन्हें प्याज लहसुन के मंहगे होने का अहसास नहीं। मगर इस बात का अहसास ज़रूर हो जाता कि चुनावी बेला में वित्त मंत्रालय का ये फैसला चुनाव में नुकसान पंहुचा सकता है।
लेकिन खैर देर आयद दुरुस्त आयद! कुछ घंटों बाद ही वित्त मंत्रालय ने खुद का ही फैसला बदल कर लोगों को राहत भी दी और अपना मजाक भी उड़वाया। सोशल मीडिया में तमाम तरह की बातें हुईं। सरकार की आर्थिक नीतियों के इतिहास-भूगोल की भी बखिया उधेड़ी गई। किसी ने गंभीरता से बात रखी तो कोई मजाक के लहजे में बोला-
आर्थिक मोर्चे पर सरकार के फैसले अक्सर रात को परवान चढ़ते रहे हैं। नोटबंदी की घोषणा से लेकर जीएसटी लागू होने का जश्न रात की तारीकियों में परवान चढ़ा था।
अर्थ व्यवस्था से जुड़े ये सारे फैसले चौकाने वाले रहे हैं। इस तरह के फरमानों से भाजपा सरकारें नये-नये आयाम और नई-नई मिसालें क़ायम करती रही हैं। ऐसे कारनामों ने कहावतों को भी नये आयाम और नई-नई सूरतों में ढाला है। एक पुरानी कहावत है- सुबह का भूला शाम को घर वापस आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते। मोदी सरकार की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस कहावत को मोडीफाई किया है। उन्होंने अपने ही मंत्रालय के एक फैसले के अंधेरे को सूरज बन कर भेद दिया और ये साबित करने की कोशिश की “रात का भूला सुबह घर आ जाये जाए तो उसे भूला नहीं कहते”।
बुधवार की रात एक खबर आग की तरह फैली। वो ये थी कि वित्त वर्ष 2021-22 की पहली तिमाही मे ही छोटी बजट योजनाओं पर ब्याज दरों में कटौती हो गई है। सरकार का ये फैसला सामने आने के बाद कुछ ही घंटों में देश के सबसे विशाल मध्यम वर्ग में नाराजगी ज़ाहिर होने लगी। और तो और सोशल मीडिया पर सरकार का गुणगान करने वाले भी बचत योजनाओं में ब्याज दरों की कटौती के खिलाफ मुखर दिखाई दिए।
अब इस सारे प्रकरण को सरकार की भूल माने या वित्त मंत्री सीतारमन की ‘चूक’. मीज़ाइल तो दाग़ी जा चुकी थी, गनीमत यह रही कि यह मिज़ाइल गॉइडेड निकली जिसका निशाने पर हमले से पहले ही रास्ता बदल दिया गया वरना लोग तो निशाना बनते ही, सरकार तक भी उसके विस्फोट की गूँज पहुँचती। खैर जो नहीं हुआ या होते होते रह गया उसपर अब क्या बहस करना। अभी तो हम यही कह सकते हैं कि चूक हो या चुनावी मजबूरी, मगर ये यू टर्न अच्छा है

