- गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में भाजपा में शामिल हुए मनजिंदर सिरसा
नई दिल्ली। दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के प्रधान मनजिंदर सिंह सिरसा बुधवार को अपने पद से इस्तीफा देने के बाद भाजपा में शामिल हो गये। अगले साल पंजाब में होने वाले विधानसभा चुनाव से पूर्व सिरसा का भाजपा में शामिल होना पार्टी को बेहद लाभ पहुंचायेगा। कोरोना काल में जनहित में कार्य करने वाले मनजिंदर सिंह सिरसा का सिख समुदाय में खासा प्रभाव है। भविष्य में दिल्ली सिख गुरुद्वारा मैनेजमेंट कमेटी का चुनाव न लड़ने का ऐलान करते हुए सिरसा ने अपने समुदाय, राष्ट्र और मानवता की सेवा पहले की तरह ही करते रहने की बात कही।
Read also: अफगान सिखों को भारत की नागरिकता मिले : सिरसा
बुधवार को दिल्ली में गृहमंत्री अमित शाह की मौजूदगी में मनजिंदर सिंह सिरसा भाजपा में शामिल हो गये। इस दौरान पार्टी के वरिष्ठ नेता और भाजपा के पंजाब चुनाव प्रभारी गजेंद्र सिंह शेखावत, राष्ट्रीय महासचिव दुष्यंत गौतम आदि मौजूद रहे। वहीं अकाली दल के नेता रहे परमिंदर सिंह बराड़ भी भाजपा में शामिल हो गए हैं। वहीं शिरोमणि अकाली दल के तेजतर्रार प्रवक्ता मनजिंदर सिंह सिरसा का भाजपा में शामिल होना पंजाब अकाली दल के लिये बड़ा झटका है। पंजाब के सिख समुदाय में पैंठ रखने वाले सिरसा जहां भाजपा को लाभ पहुंचायेंगे वहीं शिरोमणि अकाली दल को नुकसान पहुंच सकता है।
फरवरी 2020 में हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव में राजौरी गार्डन सीट से भाजपा-अकाली दल के संयुक्त प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतरने वाले मनजिंदर सिंह सिरसा ने कोरोना के दौरान दिल्ली में बहुत काम किया। मनजिंदर सिंह दिल्ली के सिख बहुल्य वेस्टर्न इलाका में पैंठ रखते हैं जहां के सिखों का किसी ना किसी रूप में पंजाब से संबंध है। पंजाब के चुनाव में अहम भूमिका निभाने वाले सिरसा का साथ भाजपा के लिये लाभदायक होगा।
Read also: उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में क्या मिथक तोड़ पायेगी भाजपा
वहीं शिरोमणि अकाली दल के प्रवक्ता दलजीत सिंह चीमा ने मनजिंदर सिंह सिरसा के भाजपा में शामिल होने को खालसा पंथ पर बड़ा हमला बताया। उन्होंने कहा कि सिख धर्म को कंट्रोल करने की यह केंद्र की पुरानी नीति रही है। चीमा ने भाजपा पर घटिया राजनीति करने का आरोप लगाते हुए कहा कि सिरसा को जबरदस्ती भाजपा में शामिल कराया गया है। चीमा ने कहा कि इंदिरा गांधी वाली इस नीति को अपनाकर भाजपा अपने मंसूबों में कभी कामयाब नहीं हो सकती। यह धार्मिक मामलों में दखलअंदाजी के साथ सिखों के साथ बड़ी बेइंसाफी है। यह लोकतंत्र का कत्ल है और खालसा पंथ इसे किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं करेगा।

