जगन्नाथ की रथयात्रा 12 जुलाई से शुरु हो रही है, ओडिशा के पुरी में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा रथ में बैठकर जगन्नाथ मंदिर से गुंडिचा मंदिर पहुंचते हैं। परंपरा के अनुसार, तीनों यहां एक हफ्ते तक विश्राम करते है | आपकी जानकारी के लिए बता दे की रथयात्रा उत्सव को यूनेस्को द्वारा पुरी को वर्ल्ड हेरिटेज की लिस्ट में शामिल किया गया है।
रथयात्रा की तैयारियां सूर्योदय से पहले शुरू कर दी जाती हैं। भगवान को खिचड़ी का भोग लगाया जाता है और रथ प्रतिष्ठा और अन्य विधियां शुरू होती हैं। इसके अलावा रथ को खींचने में इस्तेमाल होने वाली रस्सियां उन कपड़ों से बनी होती हैं जिन्हें भगवान को सालभर पहनाया जाता है। तीनों रथों की पूजा और उनपर विराजमान प्रतिमाओं का श्रृंगार होता है।
रथ को बनाने के लिए लकड़ियों का इस्तेमाल किया जाता है , दस्पल्ला जंगलों से लकड़ियां लाई जाती हैं। तकरीबन 4000 लकड़ी की जरूरत पड़ती है। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र व सुभद्रा के रथ नारियल की लकड़ी से बनाए जाते हैं। भगवान जगन्नाथ के रथ का रंग लाल और पीला होता है और ये दूसरे रथों की तुलना में बड़ा भी होता है।
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रथों की सीढ़ियों को खोला जाता है व भगवान बलभद्र के रथ से काले, बहन सुभद्रा के रथ से भूरे और भगवान जगन्नाथ के रथ से सफेद घोड़े जोड़े जाते हैं। आगे भगवान बलभद्र का रथ, बीच में बहन सुभद्रा और पीछे भगवान जगन्नाथ का रथ होता है। सूरज डूबने से पहले तीनों रथ गुंडिचा मंदिर पहुंचते हैं और भगवान यहां 7 दिन तक रहते हैं।

