धूप में सूख कर चाशनी में घुलने को तैयार हैं सेवईंयां

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सेवई की मिठास सालों साल हर जबान पर रहती है, लेकिन ईद की सेवईं की बात ही अलग है। रमजान का चांद निकलते ही चारों तरफ सेवईं और लच्छों की बाजार सज जाता है, लेकिन यह काम एक महीने का नहीं बल्कि महीनों पहले शुरू हो जाता है। कई परिवार गांव से यहां आकर बस जाते हैं तो कुछ दूसरे कारोबार करने वाले भी इस सेवई बनाने के काम में लग जाते हैं। यही वजह है कि पुराने लखनऊ की दरगाह रोड और कैम्पल रोड स्थित सेवईं के कारखानों में आज कल दिन रात काम चल रहा है। जैसे जैसे ईद नजदीक आ रही है सेवईं बनाने वाले अपने ऑर्डर को सही टाइम पर पूरा करने में लगे हुए हैं।

ramdan special swai
Image Credit: Naeem Ansari

रजब के महीने से शुरू करते हैं काम

1988 से दरगाह रोड पर सेवईं का कारखाना चला रहे मोहम्मद आसिफ कहते हैं कि हमारा काम तो ईद से चार महीने पहले ही शुरू हो जाता है। जैसे ही रजब का महीना आता है हमारे कारखाने खुल जाते हैं। पूरा परिवार ही इस सेवईं बनाने में लग जाता है। पहले सेवईं को मशीन से निकाला जाता है फिर धूप में सुखाया जाता है और भट्टी में भुन कर सेवईं बाजार जाने के लिए तैयार होती है। जैसे-जैसे ईद नजदीक आती है हमारे कारखाने में भी काम तेज हो जाता है। हमें ऑडर्र बाहर भी भेजने होते हैं इसलिए पहले से काम करना जरूरी होता है।

Ramdan Specail Sewai
Image Credit: Naeem Ansari

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ज्यादा प्रॉफिट नहीं, मगर शुक्र है

पिछले दो साल को याद करते हुए आसिफ कहते हैं कि गुजरे दो साल तो हमारे लिए बुहत खराब गुजरे थे। कोरोना महामारी की वजह से पूरी तरह से काम बंद हो गया था। इस बार बहुत अच्छा प्रॉफिट तो नहीं मिला है लेकिन फिर भी अल्लाह का शुक्र है कि काम तो चल रहा है। मैदा पहले से महंगा हो गया है। हमें लगता था कि 38 सौ से 4 हजार कुतंल तक माल जाएगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं। इस बार माल 33 सौ और 34 सौ कुंतल ही जा रहा है। लेकिन फिर भी ठीक है कि कि कम से कम काम बंद तो नहीं है चल तो रहा है। हमारी तो रीजी रोटी भी इसी पर निर्भर करती है।

Ramdan Specail Sewai
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पूरा परिवार लग जाता है

गोंडा बलरामपुर से करीब पांच महीने पहले सेवईं का काम करने आए सगीर अहमद बताते हैं कि इस बार धूप की वजह से सेवईं का प्रोडक्ट काफी अच्छा हुआ है। बाहर के ऑडर में अब तक हमारी सात से आठ गाडियां जा भी चुकी हैं। सगीर बताते हैं ईद के कुछ महीने पहले वह और उनका पूरा परिवार लखनऊ आकर सेवईं के कारखाने में ही काम करते हैं। वहीं नक्खास में सेवईं लच्छे के विक्रेता मोहम्मद फरहान ने बताया कि इस बार सेवईं का प्रोडक्ट अच्छा हुआ है। दाम में तो ज्यादा फर्क नहीं आया है। इस बार क्वालिटी के हिसाब से हर तरह की सेवई में दो रुपए दाम ही बढ़े हैं। दुकान के साथ हमारा कारखाना भी है जो सालों पुराना है। सालों साल हम सेवई का काम ही करते हैं और हमारा पूरा परिवार इन दिनों इसी काम में लग गया है। ईद के बाद चार महीने ही हम खाली रहते हैं वरना पूरा वक्त हम अपने कारखाने में ही काम करते हैं।

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बच्चों का खेल भी बन जाते हैं कारखाने

सेवईं के कारखाने में जहां मौसम की तपिश के साथ भट्ठी की गरमी को सहन कर पाना मुश्किल होता है ऐसे में बच्चों को खेलते देखना अजब लग सकता है। लेकिन यह बच्चे इन दिनों कारखाने में अपने खेल भी खेल रहे हैं। कोई सेवई के परदों के बीच लुका छुपी खेलता है तो कुछ तो जमीन पर बची हुई सेवईं को बिछा कर लेट ही जाते हैं। बहराइच से काम करने आए हशमत अली और शमीम बताते हैं यह हमारा पुरखों का काम है। हमारे बच्चे भी पढ़ाई के बाद इस काम को देखते और सीखते हैं।

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