-फरीद वारसी

पिछले दिनों अचानक खबर आती है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर पर चर्चा के लिए राज्य के सभी राजनीतिक दलों के नेताओं की एक सर्वदलीय बैठक बुलाई है। वैसे यह प्रधानमंत्री का स्वभाव नहीं है कि वे किसी मुद्दे पर चर्चा के लिए विपक्षी दलों के नेताओं की बैठक बुलाएं। कहा जाता है कि उनका तो स्वयं फैसला लेकर कर अचानक देश पर थोपने का अपना अंदाज है। वहीं दूसरी ओर यह पहला मौका था कि राज्य से धारा 370 व 35 ए हटाए जाने के बाद प्रधानमंत्री की ओर से वहां के नेताओं को चर्चा के लिए बुलाया गया था। इसलिए राजनीतिक गलियारों तरह-तरह की अटकलों का बाजार गर्म था कि प्रधानमंत्री जम्मू-कश्मीर को लेकर आखिर क्या करने वाले हैं? गोदी मीडिया को तो एक नया मसाला मिल गया था, जो पाकिस्तान से भी खबरें निकाल कर प्रसारित करने लगा कि प्रधानमंत्री द्वारा सिर्फ बैठक बुलाए जाने मात्र से पड़ोसी देश कैसा बेचैन हो गया। बहरहाल, निर्धारित दिन और समय पर प्रधानमंत्री आवास पर उपरोक्त बहुचर्चित बैठक हुई। मीडिया में आई खबरों के अनुसार बैठक बहुत ही खुशनुमा माहौल में हुई और प्रधानमंत्री ने राज्य के नेताओं की मन की बातें सुनने के बाद यह आश्वासन दिया कि वे दिल्ली और दिल की दूरी खत्म करना चाहते हैं। मोदी सरकार का नए-नए जुमले व नारे गढ़ने का रिकार्ड कोई नया नहीं है। यही कारण है कि राहुल गांधी केद्र सरकार को जुमलेबाजी की सरकार कहते हैं। मालूम हो कि 2014 प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई की जम्मू-कश्मीर पर इंसानियत, कश्मीरियत और जम्हूरियत की नीति को बढ़ाने का वादा किया था। किन्तु 2019 का लोकसभा चुनाव जीतने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने वाजपेई की नीति को ठंडे बस्ते में डाला और संघ व भाजपा के हिन्दुत्व के एजेंडे को लागू करते हुए बगैर किसी पूर्व सूचना और देश को चैकाते हुए जम्मू-कश्मीर से धारा 370 व 35ए हटाने का काम किया था। और अब उसी राज्य में विश्वास बहाली के लिए दिल्ली और दिल की दूरी कम करने का नया नारा गढ़ा गया है। कहीं इसका भी हाल वाजपेई की नीति की तरह अलग-थलग करने का न हो, क्योंकि मोदी सरकार अपनी ही नीतियों पर एक जगह स्थिर रहने की आदी नहीं है।
खैर, जानकारों के मुताबिक जिस मोदी सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर से धारा 370 व 35ए हटाने के मुद्दे पर घाटी के नेताओं को धोखे में रखा गया हो, यहां तक उनसे झूठ बोला गया हो कि वहां ऐसा कुछ भी नहीं होने जा रहा है जिसकी आशंका आप व्यक्त कर रहे हैं। अब उन्हीं नेताओं को जम्मू-कश्मीर से धारा 370 व 35ए हटने के बाद राजनीति चर्चा जैसे परिसीमन, चुनाव, पूर्णराज्य का दर्जा देने व राज्य में लोकतंत्र मजबूत करने जैसी बातंे करने के लिए दिल्ली बुलाया जाता है तो मोदी सरकार की यह कवायद अकारण नहीं लगती है, बल्कि सोची समझी रणनीति का हिस्सा जान पड़ती है। वह भी तब जब उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव को लेकर दिल्ली से लेकर लखनऊ तक तरह-तरह की राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हों। सुधी पाठक हैरान न हो यह सोचकर कि भला उत्तर प्रदेश के चुनाव से पहले जम्मू-कश्मीर पर राजनीतिक चर्चा किए जाने का क्या संबंध? संबंध भाजपा की राजनीति के लिहाज से काफी गहरा है जिसकी चर्चा करने से पूर्व यहां यह बताते चलें कि 2022 के विधानसभा चुनाव परिणाम ही देश के अगले 2024 के लोकसभा चुनाव की तस्वीर को स्पष्ट करेगा। क्यांेकि दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर गुजरता है। अतः 2024 के लोकसभा चुनाव में अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए भाजपा की रणनीति के लिहाज से यह जरूरी है कि पहले उत्तर प्रदेश में अपनी जीत पुख्ता की जाए। जहां भाजपा के लिए राजनीतिक हालत साजगार नहीं हैं। जिसको अनुकुल करने के लिए ऐड़ी-चोटी बल लगाया जा रहा है। चुनाव जीतने के लिए जाहिर सी बात है मुद्दों का होना जरूरी हो। और मुद्दे अगर ऐसे हों जो अपनी घोर नाकामियांे पर पर्दा डालने के साथ लोगों की भावनाओं को भड़काने का काम करें, तो फिर क्या कहने, यह तो सोने पर सुहागे जैसी बात होगी। फिर भावनात्मक मुद्दों को चुनाव प्रचार का हिस्सा बनाने में भाजपा चैपिंयन है।
विदित हो कि 2014 से लेकर अब तक हुए दो लोकसभा चुनाव और देश के तमाम राज्यों के हुए विधानसभा चुनाव में कोई शायद ही ऐसा चुनाव नहीं बचा जहां भाजपा ने चुनावी चर्चा व प्रचार में कश्मीर, पाकिस्तान और आतंकवाद का जोर-शोर से बखान न किया हो। 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में खुद अमितशाह ने कहा था कि अगर भाजपा हारी तो पाकिस्तान में पटाखे दगेंगे। बिहार के पिछले चुनाव में भी भाजपा नेताओं की ओर से यह कहा गया कि अगर लालू की पार्टी जीती तो बिहार में आतंकवादियांे को प्रशिक्षण मिलेगा। केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह तो आए दिन वर्ग विशेष को पाकिस्तान भेजने की धमकी देते रहे हैं। सर्जिकल स्ट्राईक, पुलवामा हमला और एअर स्ट्राईक को चुनावों में कैसे मुद्दा बनाया गया, यह किसी से छिपा नहीं है। धारा 370 हटने के बाद बिहार के विधानसभा चुनाव उसका श्रेय लेने की कोशिश की गई। और उन्हीं नेताआंे को कटघरे में खड़ा किया गया था, जिन्हें 24 जून को दिल्ली वार्ता के लिए बुलाया गया। इससे इंकार नहीं किया जा सकता है कि घाटी में कई ऐसे राजनीतिक दल है जो राज्य में धारा 370 व 35 ए की बहाली की मांग कर रहे हैं। ऐसे यूपी के चुनाव में भाजपा यहां तक स्वयं प्रधानमंत्री यह प्रचार करने से संकोच नहीं करेंगे कि मैं और मेरी सरकार जम्मू-कश्मीर में नई राजनीतिक पहल कर वहां लोकतंत्र को मजबूत करना चाहती है लेकिन कुछ लोग हैं जो नहीं चाहते है कि वहां नई सुबह हो। अभी पिछले दिनों धारा 370 व 35 ए पर कांगे्रस नेता दिग्विजय सिंह के बयान को भाजपा तूल दे ही चुकी है। धारा 370 व 35 ए के हटाने के तौर तरीकों पर कांगे्रस नेतृत्व से अलग विचार रखने वाले सिंधिया आज भाजपा में शामिल हो ही गए हैं। भाजपा की ओर से राहुल पर इस बात के आरोप लगते रहते है कि वे पाकिस्तान की भाषा बोलते हैं। फिर पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती सईद यह कह कर भाजपा को और चुनावी ईधन मुहैया करती रहती हैं कि जब तालिबान से बात हो सकती है तो भला पाकिस्तान से क्यों नहीं? ऐसे राजनीति के जानकारों का मानना है कि उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में प्रचार के दौरान कश्मीर, पाकिस्तान और आतंकवाद जैसे मुद्दों को तय करने रणनीति बनाने के बाद ही संभवता प्रधानमंत्री की ओर से इस बात की पहल की गई कि वे जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर महज चर्चा के लिए वहां के नेताओं से वार्तालाप करें। ताकि चुनाव से पहले कश्मीर को चुनावी चर्चा के केंद्र में लाया जा सके। जाहिर सी बात है कि उपरोक्त बैठक के बाद घाटी में राजनीतिक दलों के द्वारा कुछ तो बयानबाजी होगी, फिर पाकिस्तान की तरफ से भी बयानबाजी की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता है। जिसकी प्रतिक्रिया में भाजपा भी चुप नही रहेगी। इसके अलावा भाजपा का गढ़ बन चुके जम्मू और घाटी के नेताओं के कटु रिश्ते किसी से छिपे नहीं हैं जिनके बयान आग में घी डालने का काम करते है और भाजपा दरअसल इसी तरह की किसी स्थिति के इंतजार में रहेगी ताकि यूपी के चुनाव में वह उसका राजनीतिक फायदा उठाने का प्रयास करे। दूसरी ओर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार व बंगाल के विधानसभा चुनाव में राममंदिर निर्माण का श्रेय लेने का प्रयास भाजपा के लिए कोई खास सुखद नहीं रहा। खासतौर से बंगाल के विधानसभा चुनाव में भाजपा को तो मुंह की खानी पड़ी। इधर जिस तरह से राम मंदिर निर्माण के संबंध में जमीन के घपले-घोटाले सामने आए हैं और उस पर लीपा पोती की कोशिशें नाकाफी साबित हुई हैं, उससे उत्तर प्रदेश में भाजपा की स्थिति और भी कमजोर हुई है। सो ऐसे में चुनाव में राम मंदिर निर्माण का सेहरा अपने सिर बांधना भाजपा के लिए घाटे का सौदा साबित न हो, इसलिए भावनात्मक मुद्दों की अपनी पोटली से कश्मीर, पाकिस्तान और आतंकवाद जैसे मुद्दों का झाड़-पोछ कर उसका कलेवर बदलने की कोशिश हो रही है। अब चुनावों में भाजपा को इसका कितना लाभ मिलेगा, यह तो वक्त ही बताएगा। लेकिन हां, इतना जरूर है कि पहले से ही बढ़ती मंहगाई से त्रस्त व कोविड-19 में योगी-मोदी सरकार की नाकामियों का शिकार हुई आमजनता के लिए उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव किसी परीक्षा से कम नहीं हैं क्यांेकि उन्हें भावनात्मक रूप से गुमराह करने का ताना बाना बुना जा चुका है, बस चुनावी घोषणा होने का इंतजार है।

