कर्नाटक में चुनावी सरगर्मियां तेज़ हैं, सत्ता पाने और सत्ता बरकरार रखने के लिए भाजपा और कांग्रेस पूरा ज़ोर लगाए हुए हैं. प्रधानमंत्री और गृह मंत्री अमित शाह के धड़ाधड़ दौरे हो रहे हैं, रोड शो हो रहे हैं. यानि चुनाव की घोषणा से पहले सत्ताधारी भाजपा पूरा माहौल भाजपामय बना देना चाहती है. इस बीच प्रदेश की भाजपा सरकार ने एक और राजनीतिक दांव खेलते हुए OBC के भीतर मुसलमानों को मिलने वाले 4 फीसद के रिजर्वेशन को ख़त्म करने की घोषणा कर दी है और रिजर्वेशन के इस कोटे को लिंगायत और वोक्कालिगा समुदायों के बीच बांट दिया है. इसे राज्य के सबसे प्रभावशाली दो समुदायों पर पकड़ हासिल करने का कदम माना जा रहा है क्योंकि भाजपा मुसलमानों से ये आरक्षण छीनकर एक चुनावी सन्देश भी देना चाहती है ताकि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण तेज़ हो.
लिंगायत और वोक्कालिगा में शिफ्ट किया मुसलमानों का कोटा
शुक्रवार को बोम्मई कैबिनेट ने ओबीसी कोटा के तहत मुसलमानों को मिलने वाले 4 फीसदी आरक्षण को खत्म कर दिया और उन्हें आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए कोटे में शामिल कर दिया है जिसमें ब्राह्मण और अन्य ऊंची जातियों के कई समुदाय शामिल हैं, ये आरक्षण पहले 10 प्रतिशत था. अब मुसलमानों को मिलने वाला चार प्रतिशत आरक्षण लिंगायत और वोक्कालिगा समुदायों में शामिल कर दिया है जिसके बाद अब लिंगायत समुदाय का कोटा सात और वोक्कालिगा समुदाय का कोटा 6 प्रतिशत हो गया है.
संभावित नुक्सान के भरपाई की कवायद
सरकार के इस फैसले का बचाव करते हुए मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई ने कहा कि धर्म आधारित आरक्षण की कोई गुंजाइश संविधान की मान्यता के अनुसार नहीं है। इसलिए सरकार ने सभी समुदाय के आर्थिक रूप से गरीब लोगों के लिए ये कदम उठाया है। चुनाव की बात करें तो लिंगायत समुदाय को परंपरागत रूप से भाजपा समर्थित माना जाता है, चूँकि इस बार उसे इस समुदाय का वोट खिसकने का डर पैदा हुआ है इसलिए उसे लुभाने के लिए दो प्रतिशत का आरक्षण बढ़ाया गया है, वोक्कालिगा समुदाय पर भाजपा का उतना प्रभाव नहीं है लेकिन लिंगायत समुदाय से होने वाले किसी भी नुक्सान की भरपाई के लिए इस समुदाय को भी लुभाने की कोशिश की गयी है.

