Kalimath Mandir – यहां मां काली की मूर्ति की नहीं बल्कि कुंड की होती है पूजा

धर्मKalimath Mandir - यहां मां काली की मूर्ति की नहीं बल्कि कुंड...

Date:

रुद्रप्रयाग- देवभूमि उत्तराखंड में मां काली का एक बड़ा और प्रसिद्ध मंदिर रुद्रप्रयाग जिले में स्थित है. देवी काली को समर्पित कालीमठ मंदिर में आने वाले भक्त मूर्ति की पूजा नहीं करते यहां पर एक कुंड की पूजा की जाती है. जिसे केवल पुजारी अकेले में संपन्न करता है. कालीमठ मंदिर को लेकर कई तरह की धार्मिक मान्यताएं हैं कहा जाता है कि महान लेखक तुलसीदास ने भी यहां तपस्या की थी, साथ ही इस स्थान को मां काली की उत्पत्ति का स्थान भी कहा जाता है. केदारनाथ की चोटियों से गिरा हिमालय में सरस्वती नदी के किनारे स्थित सिद्ध पीठ कालीमठ मंदिर तंत्र साधना के लिए मां कामाख्या और ज्वालामुखी के की तरह ही उच्च कोटि का माना जाता है.

मंदिर में नहीं है कोई मूर्ति

मां शक्ति के सिद्ध पीठों में से एक कालीमठ मंदिर में मां काली की कोई मूर्ति मौजूद नहीं है. यहां पर आने वाले भक्तों किसी प्रतिमा की पूजा नहीं करते बल्कि यहां पर कुंड को ही पूजा जाता है. मान्यता है कि राक्षसों के वध के बाद मां काली इसी कुंड में अंतर्ध्यान हो गई थी. इस कुंड को रजतपट श्री यंत्र से ढका गया है. केवल साल में एक बार शारदे नवरात्रि की अष्टमी के दिन यह कुंड खोला जाता है. इस कुंड की पूजा केवल मध्य रात्रि में केवल मुख्य पुजारी के द्वारा ही संपन्न की जाती है. मंदिर में एक अखंड ज्योति निरंतर जलती रहती है.

गुस्से में मां का शरीर पड़ा काला

कालीमठ मंदिर को लेकर कई तरह की धार्मिक मान्यताएं हैं कि जब रक्तबीज नाम के राक्षस का आतंक बहुत अधिक बढ़ गया था. तब माता इस मंदिर से करीब 8 किलोमीटर दूर काली शीला पर 12 साल की बालिका के रूप में प्रकट हुई. कहा जाता है कि देवताओं पर रक्तबीज के आतंक से मां बहुत क्रोधित हुई और उस क्रोध के चलते मां का शरीर काला पड़ गया. कहा जाता है कि मंदिर के पास ही रक्तबीज शीला है जहां पर माता ने रक्तबीज का वध किया था. रक्तबीज को वरदान था कि जहां भी उसके खून की बूंद गिरेगी वहां एक दूसरा रक्तबीज पैदा हो जाएगा. इसीलिए मां काली ने रक्तबीज का धड़ सर से अलग कर दिया और उससे गिरने वाले खून को अपनी जीवा से चाट लिया. कहा जाता है कि मंदिर के पास आज भी वह शीला मौजूद है. रक्तबीज का वध करने के बाद माता शांत नहीं हुई तो उनको शांत करने के लिए भगवान भोलेनाथ उनके पैरों के नीचे लेट गए. शिव के सीने में पैर रखते ही देवी कालि का गुस्सा शांत हो गया और कालीमठ मंदिर में ही मां काली कुंड में अंतर्ध्यान हो गई.

काली शीला से आज भी निकलता है खून

जिस शिला पर मां ने रक्तबीज का वध किया था उस सिला से कहा जाता है कि दशहरे के दिन आज की रक्त निकलता है कालीमठ मंदिर के ही पास नदी के किनारे काली शीला स्थित है.

Share post:

Subscribe

Popular

More like this
Related