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जानिए 338 साल पुराने Jhanda Mela ने देहरादून को कैसे दी उसकी पहचान?

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देहरादून- उत्तराखंड का एक ऐसा मेला जो सुबे की राजधानी के अस्तित्व का सबब बन गया. यह वही मेला है जिसमें देहरादून को नाम दिया. हम बात कर रहे हैं 3 शताब्दी से चल रहे “झंडेजी” के मेले की. जितना पुराना प्रचलन इस मेले का है उतनी ही पौराणिक प्रथाएं इस मेले की है. पंजाब में जन्मे गुरु राम राय महाराज के जन्म उत्सव के तौर पर शुरू हुए यह मेला आज पूरे भारत ही नहीं अपितु एशिया के बड़े मेलो में शुमार है. कहा जाता है कि गुरु रामराय महाराज ने यहां डेरा डाला था जिसे उस समय डेरादून कहा जाने लगा, जो बाद में देहरादून कहलाया. आज हम आपको देहरादून के झंडे के मेले के महत्व और पौराणिक इतिहास के बारे में बताते हैं.

डेरादून से देहरादून का सफर

नानक पंथ के साथ से गुरु हर राय महाराज के बड़े पुत्र राम राय बचपन से ही अलौकिक शक्तियों के स्वामी थे. उन्होंने अल्पायु में ही बहुत ज्ञान अर्जित किया, छोटी उम्र में ही बैराग धारण कर वह संगठन के साथ भ्रमण पर निकल गए. अपने भ्रमण के दौरान वे 1675 में चैत्र कृष्ण पंचमी के दिन दून पहुंचे. माना जाता है कि उनकी प्रतिष्ठा में झंडा मेला की शुरुआत हुई जो आज एक बड़े वार्षिक समारोह का रूप ले चुका है. देहरादून के खुद बूढ़ा इलाके में गुरु रामराय घोड़े का पैर जमीन में धंस गया और उन्होंने संगत को यहीं रुकने का आदेश दिया. बताया जाता है कि महाराज ने चारों दिशाओं में तीर चलाए और जहां तक तीर गए इतनी जमीन पर अपनी संगत को ठहरने का हुक्म दिया. गुरु राम राय महाराज ने यहां डेरा डालने के कारण जिला के कान्हा डेरादून पर पड़ गया जो बाद में डेरादून से देहरादून कहलाया.

आज भी चिट्ठी से भेजें जाते हैं निमंत्रण

झंडा दरबार साहिब में आज करीब 5000 से ज्यादा लोगों के पते दर्ज हैं. सूचना क्रांति के इस युग में भी मेले की सूचना संगत को देने के लिए चिट्ठी भेजी जाती है. पंजाब की पैदल संगत को आमंत्रित करने के लिए दरबार से प्रतिनिधि महंत के नाम का आदेश लेकर बड़ागांव जाता है. इसके अलावा पहले भी लकड़ी की कैची से झंडे जी का आरोहण होता था और आज भी यही परंपरा बदस्तूर जारी है.

दर्शनी गिलाफ से सजते हैं “झंडेजी”

मेले में ‘झंडेजी’ पर गिलाफ चढ़ाने की परंपरा है. पंचमी के दिन पूजा अर्चना के बाद पुराने झंडे को उतारकर ध्वज दंड में लगे पुराने गिलाफ,दुपट्टे आदि को हटाया जाता है. जिसके बाद दरबार के सेवक दही, घी और गंगाजल से ध्वज दंड को स्नान कर आते हैं. जिसके बाद झंडे जी को गिलाफ चढ़ाने की प्रक्रिया शुरू की जाती है. ‘झंडेजी’ पर पहले सादे और फिर सनील के गिलाफ चढ़ाए जाते हैं सबसे ऊपर दर्शनी गिलाफ चढ़ाया जाता है. ‘झंडेजी’ पर गिलाफ चढ़ाने के लिए बुकिंग कराई जाती है. इस बार जालंधर के संसार सिंह को बरसों के इंतजार के बाद ‘झंडेजी’ पर दर्शन एक गिलाफ चढ़ाने का सौभाग्य मिला है.

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