उत्तर प्रदेश के देवबंद शहर में कल से चल रहे जमीअतुल उल्माए हिन्द महमूद मदनी गुट के राष्ट्रीय अधिवेशन का आज समापन हुआ. अधिवेशन के दुसरे दिन ज्ञानवापी मस्जिद, मथुरा की ईदगाह, हिंदी भाषा, संवैधानिक अधिकार , कॉमन सिविल कोड, इस्लामी शिक्षाओं पर फैली गलतफहमियों समेत पांच प्रस्ताव पेश किये गए जिनको अधिवेशन में मंज़ूर किया गया और जमीअत के लोगों से इन प्रस्तावों पर अमल करने के लिए जुट जाने की अपील की गयी.
अधिवेशन के दूसरे दिन के अंतिम सम्बोधन में संगठन के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने कहा कि नफ़रत फैलाने वाले देश में अल्पसंख्यक हैं, यह देश की एकता और अखंडता की बात करें तो राष्ट्रधर्म और हम एकता और अखंडता का नारा लगाएं तो तंज़? मौलाना ने कहा कि इस देश की हिफाज़त के लिए अगर हमार जान भी चली जाय तो यह हमारे लिए सौभाग्य की बात होगी। उन्होंने कहा कि अच्छी तरह समझ लीजिये यह हमारा मुल्क है, हम इस मुल्क के शहरी है हमारा मज़हब अलग है ज़रूर, हमारी तहज़ीब अलग है, हमारे खाने पीने का तरीका अलग है, अगर तुमको बर्दाश्त नहीं है मेरा मज़हब तो तुम कहीं और चले जाओ. मौलाना ने कहा कि यह लोग आये दिन हमें पाकिस्तान भेजने की बात करते हैं, तो मैं कहता हूँ कि तुमको मौका नहीं मिला , हमें मौका मिला था लेकिन हमने रिजेक्ट कर दिया इसलिए पाकिस्तान भेजने की बात करने वाले खुद पाकिस्तान चले जाएँ।
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समान नागरिकता कानून की चल रही बातों पर मौलाना मदनी ने कहा कि कानून कोई भी बन जाय लेकिन अगर मुस्लिम क़ौम यह तय कर ले कि उसे शरीयत पर चलना है तो कोई भी कानून कुछ नहीं कर सकता। उन्होंने तलाक के बारे में कहा कि शादी से पूर्व लड़की और लड़के को तालीम देने की ज़रुरत है, बताने की ज़रुरत है कि किन हालात में तलाक़ दी जा सकती है और जबतक दोनों को तालीम न दी जाय निकाह न हो भले ही थोड़ी देर हो जाय. इसके बाद अगर अलग होने के कुछ हालात बनते हैं तो दोनों जब राज़ी होंगे तो कोई भी कानून रास्ता नहीं रोक सकता।
मौलाना ने कहा कि हमें शरीयत को मज़बूती से पकड़ना है. असल लड़ाई तो हमारी हमारे साथ है दूसरों के साथ नहीं, वह तो बनाई गयी है जिसके खिलाफ हम खड़े हुए हैं. हमारी तवज्जो भी अपने असल मामलात से हटाकर बाहर की तरफ कर दी गयी है, हमें अपने इंटरनल क्राइसिस से लड़ने की ज़रुरत है. सद्भावना संसद की जगह आज सद्भावना मंच शब्द का इस्तेमाल करते हुए मौलाना ने कहा कि यह बहुत महत्वपूर्ण प्रस्ताव हैं और इस मंच में दूसरे मज़हब के लोगों को साथ लेने की ज़रुरत है, उन्हें अपने साथ जोड़ने या उनके साथ जुड़ने की ज़रुरत है.

