जमीअतुल उलमा के दो दिन चले राष्ट्रीय अधिवेशन के दूसरे दिन आज पेश किये पांच प्रस्तावों में दो प्रस्ताव सबसे ज़्यादा महत्त्व के थे, इन प्रस्तावों का कल से मीडिया को इंतज़ार था. यह प्रस्ताव थे कॉमन सिविल कोड और वाराणसी-मथुरा विवाद। जलसे में समान नागरिकता संहिता का प्रस्ताव पेश करते हुए कहा गया कि इस तरह के मुद्दे उठाकर अल्पसंख्यकों को मूल संवैधानिक अधिकारों से वंचित करने का प्रयास किया जा रहा है. प्रस्ताव में कहा गया कि मुस्लिम पर्सनल लॉ में शामिल निकाह, तलाक, विरासत जैसे क़ायदे किसी समाज, तंज़ीम या किसी शख्स के बनाए हुए नहीं हैं. ये सारे क़ायदे कुरआन और हदीस की रौशनी में बनाये गए हैं, बिलकुल उसी तरह जैसे नमाज, रोजा या हज धार्मिक आदेशों का हिस्सा है.
धारा 25 में स्पष्ट है कि पर्सनल लॉ में बदलाव या उसपर अमल से रोका नहीं जा सकता इसके बावजूद असम जैसे कई भाजपा शासित राज्यों में सत्तासीन लोग पर्सनल लॉ को खत्म करने की साज़िश के तहत ‘कॉमन सिविल कोड ’ लागू करने की बात कर रहे हैं और संविधान की सच्ची भावना की अनदेखी कर रहे हैं.
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वहीँ ज्ञानवापी मस्जिद और मथुरा ईदगाह विवाद पर पेश प्रस्ताव में कहा गया कि पुरानी इबादतगाहों पर बार-बार विवाद खड़ा करके देश का माहौल ख़राब करने की कोशिश की जा रही है. प्रस्ताव में इस तरह की कोशिश करने वाले संगठनों की निंदा की गयी है. प्रस्ताव के मुताबिक वाराणसी और मथुरा की निचली अदालतों के आदेशों में 1991 के प्लेसेस ऑफ़ वरशिप एक्ट की अवहेलना की गयी है और बाबरी मस्जिद के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की भी अनदेखी हुई है. इसके साथ ही अधिवेशन में इस बात को भी स्पष्ट कर दिया गया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ में किसी भी तरह का हस्तक्षेप मुस्लमान स्वीकार नहीं करेगा।

