जमीअत उल्माए हिन्द के देवबंद में चल रहे राष्ट्रीय अधिवेशन के दूसरे दिन आज कई प्रस्ताव पेश हुए जिनमें एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव हिंदी और दूसरी रीजनल भाषाओं को लेकर था. अधिवेशन में इस सिलसिले में प्रस्ताव को पेश करते हुए कहा गया कि हिंदी देश की राष्ट्र भाषा है जबकि उर्दू हमारी मातृ भाषा है इसलिए हमें मातृ भाषा के साथ राष्ट्र भाषा और और देश की दूसरी भाषाओँ को साथ लेकर चलने की ज़रुरत है.
अधिवेशन में कहा गया कि हिंदी से नफरत की कोई वजह नहीं, इस देश की राष्ट्र भाषा से नफरत करने की नहीं बल्कि उसे अपनाने की ज़रुरत है. इस प्रस्ताव में आलिमों और वक्ताओं से अपील की गयी की वह दीनी जलसों में हिंदी में अपनी बातों को पेश करें। प्रस्ताव में कहा गया कि हिंदी को अकादमिक लैंगुएज के रूप में अपनाना चाहिए। आगे कहा गया कि मुसलमानों ने अंग्रेजी को इल्मी ज़बान के रूप में 100 से अपनाने की कोशिश हो रही है, अंग्रेजी ज़बान तो सात समंदर पार से आयी है जबकि हिंदी तो हिन्दुस्तान की ही ज़बान है.
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वहीँ इस्लामी शिक्षा के सिलसिले में फैली गलतफहमियों और उनको दूर करने के लिए किये जाने का प्रस्ताव भी पेश किया। प्रस्ताव में कहा गया कि इन दिनों इस्लाम को लेकर जिस तरह का प्रोपेगंडा मीडिया के जरिया फैलाया जा रहा है वह बड़ी चिंता का विषय है. इन गलतफहमियों को दूर करने की बहुत सख्त ज़रुरत है. इसके लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल और इस्लामी क्विज जैसे कार्यक्रमों का आयोजन किया जाना चाहिए जिसमें सभी धर्मों के लोगों को शामिल किया जाय.

