International Dance Day 2022 Special: बरकरार है घुंघरुओं की झंकार

लाइफस्टाइलInternational Dance Day 2022 Special: बरकरार है घुंघरुओं की झंकार

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Zeba Hasan

तबला हो या गिटार हर चीज इलेक्ट्रानिक हो चुकी है। म्यूजिक इंडस्ट्री जितनी तेजी से ग्रो कर रही है पारम्परिक म्यूजिक से जुड़े साधनों को बनाने और बेचने वाले मायूस हैं, लेकिन घुंघरू के नाम पर यही कहते हैं कि शुक्र है यह शायद कभी इलेक्ट्रानिक नहीं होंगे। जब सें डांस है तब से घंघरू हैं और खास बात यह है कि हर चीज में बदलाव हुए, फ्यूजन हुए, लेकिन घंघरू सदियों से ऐसे ही खनक रहे हैं। इंडियन डांसर्स हों या वेस्टर्न डांसर्स हर कोई इन्हें पूजता है। डांस का चलन बढ़ता जा रहा है और घुंघरुओं की झनकार पर भी और निखार आता जा रहा है। इंटरनैशनल डांस डे पर डांस और डांसर्स की रूह घंघरूओं पर एक नजर…

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कलाकर के परफेक्शन के साथ बढ़ते हैं घंघरू

पहले जहां डांस सिर्फ सिनेमा वालों या चन्द लोगों की ही पहुंच तक था, लेकिन आज डांस का क्रेज बढ़ता ही जा रहा है। इसकी वजह रियलटी शो हो या ग्लैमर की दुनिया पेरेंट्स खुद बच्चों को क्लासिकल डांस की तालीम के लिए इनकरेज कर रहे हैं। लाटुश रोड स्थित करीब 90 साल पुरानी म्यूजिक इंस्टूमेंट की शॉप अल्लन साहब एण्ड संस्स के साजिद साहब कहते हैं कि पहले के मुकाबले अब हमारे पास घंघरू खरीदने के लिए बहुत स्टूडेंट आते हैं। प्राफेशनल्स के लिए तो हम हमेशा ही बनाते लेकिन अब बच्चों के लिए तैयार घुंघरू की जोड़ी रखते हैं। जैसे जैसे डांसर्स बढ़ते हैं, उनमें परफेक्शन आता है घंघरू की संख्या भी बढ़ती जाती है। बच्चों के लिए एक पैर में पच्चीस बुने जाते हैं और बड़े कलाकार तो एक पैर में पांच सौ घुंघरू तक पहनते हैं।

ज्यादातर दुकानों पर हैं घुंघरू

करीब सत्तर साल पुरानी मेलोडी मार्ट जहां अब आधी शॉप पर मेडिकल इंस्टूमेंट आ चुके हैं। पूछने पर यहां के ओनर मोहम्मद अल्ताफ ने बताया था कि हम सितार तबला ज्यादातर इंस्टूमेंट बनाया करते थे, लेकिन डिमांड कम होने की वजह से नुकसान में हैं। वहीं घुंघरू के सवाल पर मोहम्मद अल्ताफ यही कहते हैं कि इनकी डिमांड तो पहले से बहुत बढ़ गई है। स्कूलों के साथ अब बहुत इंस्टीट्यूट खुल गये हैं और बच्चे डांस सीखने के लिए बहुत क्रेजी हैं। यहां जितनी भी म्यूजिक इंटूमेंट की दुकाने हैं ज्यादातर दुकानों पर घंघरू मिलते हैं।

पैर से निकलते हैं बोल

वैसे तो घंघरू का महत्व हर डांस और डांसर के लिए अहम होता है। कलाकार पैर में बांधने से पहने इनकी पूजा करते हैं, लेकिन कथक और घंघरू ऐसे ही हैं जैसे दिल के साथ उसकी धड़कन। कथक की एबीसीडी सीखनी हो या फिर रियाज करना हो बिना घुंघरू के कथक का आगाज नहीं होता। शहर की फेमस कथक डांसर सुरभी सिंह कहती हैं कि घंघरू डांसर के लिए पूजनीय है।वैसे तो कई डांस में घंघरू का यूज होता है, लेकिन कथक और घंघरू का बहुत गहरा नाता है। किल्ष्ट से किल्ष्ट शब्द पैर से निकलते हैं यानी बोल पैर से निकलते हैं। मैंने अपने पैरों में 25 घुघरुओं से 8 साल की उम्र में शुरुआत की थी और आज पौने दो सौ घंघरू पहनकर नाचती हूं। जैसे जैसे डांस में परफेक्शन आता है पांव भी घंघरुओं के वजन में ढलते जाते हैं। हम पांव में पहने से पहले घंघरु को माथे से लगाते हैं, अपने गुरु का स्मण करते हैं और यह हमारे लिए इतने पूजनीय है कि पहनने के बाद नापाक स्थान पर या चप्पल नहीं डालते। एक डांसर के लिए घंघरु जिन्दगी भर पूजनीय रहते हैं।

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शुरु से ही दी जाती है तालीम

डांसर, कोरियोग्राफर और इंस्ट्रक्टर अक्षय कहते हैं कि आजकल जितनी तेजी से बच्चों में डांस का क्रेज बढ़ रहा है उसी तरह इंटीट्यूट भी खुल रहे हैं। हमारे पास जो बच्चे डांस सीखने आते हैं उन्हें डांस के साथ इसकी गरिमा की तालीम भी दी जाती है और उनमें घुंघरू की गरिमा भी शामिल है। हमारे लिए जिस तरह से घुंघरुओं की अहमियत हैं हम बच्चों को भी यही तालीम देते हैं। और यह हमारी संस्कृति ही है कि क्लासिकल में जो तालीम दी जाती है वो जिन्दगी भर उनमें बसता है।

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