भारत ने कल अफ़ग़ानिस्तान को 111 रनों के विशाल अंतर से हरा दिया, विराट कोहली के बल्ले से तीन साल बाद इस मैच में शतक भी निकल आया, 19वें के शिकार भुवनेश्वर कुमार कल uplayable नज़र आये, चार ओवर में सिर्फ 4 रन देकर पंजा भी लगा दिया, कप्तान के एल राहुल ने भी पचासा जड़ दिया। देखा जाय तो कल सबकुछ भारत के लिए अच्छा ही रहा लेकिन यह अच्छा खेल तब आया जब चिड़िया खेत को चुग चुकी थी।
एक स्पोर्ट्स क्रिटिक होने के नाते कल के मैच को देखकर मैं सिर्फ इतना कह सकता हूँ कि इस मैच से पहले टीम की परफॉरमेंस और टीम के सिलेक्शन को लेकर जो सवाल उठे थे वो सभी सवाल इस जीत के बाद भी बरक़रार हैं. मुझे तो ऐसी ही जीत की उम्मीद पहले से ही थी क्योंकि मालूम था कि पाकिस्तान से मिली हार के बाद अफ़ग़ानिस्तान के खिलाडी टूट चुके हैं, मानसिक और शारीरिक तौर से भी पूरी तरह थक चुके हैं और फिर अगले ही दिन उन्हें भारत से भिड़ना था. मैच के दौरान यह सारी बातें साफ़ नज़र आ रही थी, चाहे गेंदबाज़ी हो या बल्लेबाज़ी या फिर फील्डिंग, हर क्षेत्र में अफगानी खिलाड़ी निराश और हताश ही दिख रहे थे और इस बात को मैच के बाद बातचीत में कप्तान नबी ने माना भी।
तो मेरे हिसाब से टीम इंडिया की कल की जो परफॉरमेंस दिख रही है वो आंकड़ों के हिसाब से तो अच्छी लग रही है मगर अंदर से खोखली ही है. इस तरह की जीत चाहे जितनी बड़ी हो बेकार होती है क्योंकि वह मौका निकल जाने के बाद आती है. इस तरह की जीत कुछ खिलाडियों के रिकॉर्ड को बेहतर बना देती है क्योंकि रिकॉर्ड यह नहीं बताते कि ये परफॉरमेंस किन परिस्थितियों में आये. मैच की गंभीरता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि कप्तान रोहित ने खुद बाहर बैठना मुनासिब समझा। हां उनके बाहर बैठने से कोहली को पूरे 20 ओवर खेलने का मौका ज़रूर मिला और शायद इस वजह ने कोहली के शतक के सूखे को ख़त्म करने में बड़ी मदद की. उन्हें आज पूरा मौका मिला खुद को सेट करने का और फिर अटैक करने का. अगर इस मैच में टीम इंडिया के लिए कोई चीज़ सबसे बेहतर हुई है तो वो है कोहली का शतक क्योंकि इस शतक से कोहली पर पिछले तीन सालों से चला आ रहा दबाव ज़रूर ख़त्म हुआ होगा। टी 20 विश्व कप से पहले कोहली का पूरी तरह लय में टीम इंडिया के लिए बड़ा अच्छा संकेत है।
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भुवनेश्वर की बात करें तो उनकी गेंदबाज़ी लाजवाब नज़र आयी, वैसे एशिया कप के पिछले मैचों में भी उनकी शुरूआती गेंदबाज़ी अच्छी ही रही है, समस्या तो उनके साथ डेथ ओवर में रही जिसके वो माहिर माने जाते हैं लेकिन हर बार मौके पर उन्होंने मायूस ही किया। 19 वां ओवर उन्हें शायद ज़िन्दगी भर याद रहेगा। इसलिए कल के उनके पंजे को मैं ज़्यादा महत्त्व नहीं दूंगा, वैसे कल उन्हें कप्तान राहुल ने शुरू में ही निपटा दिया, डेथ ओवर के लिए रखा ही नहीं।
कार्तिक को मौका मिला मगर बल्लेबाज़ी ही नहीं आयी, उनके फिनिशर रोल का टेस्ट भी नहीं हो पाया। दीपक चाहर कई महीनों बाद गेंदबाज़ी कर रहे थे, प्रभावित नहीं कर सके, अक्षर का भी एक आलराउंडर के रूप में टेस्ट नहीं हो सका. कार्तिक को गेंदबाज़ी करवा दी गयी. कुल मिलाकर एक मज़ाक की तरह लगा यह मैच, जिसका अंदाज़ा शायद दर्शकों को भी था और शायद इसीलिए उन्होंने स्टेडियम आकर मैच देखना मुनासिब नहीं समझा।
टीम इंडिया की नज़र से पूरे एशिया कप का अगर विश्लेषण करें तो टीम सिलेक्शन से लेकर, कप्तानी और खिलाड़ियों का प्रदर्शन सवालों के घेरे में ही दिखता है. पूरे एशिया कप में द्रविड़ और रोहित प्रयोग करते ही नज़र आये जिसका खामियाज़ा टीम को भुगतना पड़ा. भारत को टी 20 विश्वकप से पहले अभी ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ 6 टी-20 मैच खेलने हैं, देखना है कि प्रयोगों का यह दौर कब तक जारी रहेगा। सेलेक्टर्स की भी परीक्षा होगी कि इस टीम से किसको बाहर करते हैं और किसको अंदर। आखिर में इतना ही कि हमें एशिया कप का फाइनल खेलना चाहिए था मगर नहीं खेल पाए , क्यों नहीं खेल पाए इसपर गंभीरता से सोचना होगा।

