सुनील शर्मा
उत्तर प्रदेश के चुनावी रण की भेरियां बज चुकी हैं। यूं तो सभी राजनीतिक दल अपने अस्त्र-शस्त्र लेकर दल-बल के साथ मैदान में उतर चुके हैं। सभी दल यूपी में सरकार बनाने का दावा भी कर रहे हैं। लेकिन राजनीतिक सरगर्मियों और जनता के रूझान को देखें तो चुनाव दो ध्रुवीय हो चुका हैै। वर्तमान में सत्तारूढ भाजपा और पूर्ववर्ती सरकार समाजवादी पार्टी के बीच ही असली मुकाबला होने जा रहा है। राज्य में जहां भाजपा और सपा ही चर्चाओं में हैं वहीं ये दोनों दल ही लगातार चुनाव प्रचार करने में जुटे हैं।
उत्तर प्रदेश की राजनीति पूरे देश को प्रभावित करती है। ऐसे में यहां की चुनावी जंग जीतना किसी भी दल के लिये तुरूप का इक्का हो सकता है जो उसे केंद्र की राजनीति में प्रभावी स्थान दिला सकता है। केंद्र में भाजपा की सरकार होने के पीछे उत्तर प्रदेश में भाजपा के हाथ में सत्ता की कमान होना माना जाता है। ऐसे में यहां जीत का परचम लहराने के लिये सत्तारूढ भाजपा सहित समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, राष्ट्रीय लोकदल, एआईएमआईएम तक बेताब हैं। रालोद और प्रगतिशील समाज पार्टी का सपा में गठबंधन लगभग तय माना जा रहा है तो बसपा और कांग्रेस अपने दम पर चुनाव लड़ने का ऐलान कर चुकी है। सभी दल यूपी विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करने का दावा कर रहे हैं।
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चुनावी दावों से इतर राजनीतिक धरातल पर देखें तो उत्तर प्रदेश की चुनावी जंग में भाजपा और सपा ही आमने-सामने दिखाई दे रहे हैं। दो धु्रवीय होते जा रहे मुकाबले में सपा और भाजपा ही लगातार चुनावी रैलियां कर रही हैं। दोनो की पार्टियोेें के नेताओं की ओर से एक-दूसरे पर ही तीरों के बयान चलाये जा रहे हैं। हमला और पार्टियों पर भी किया जा रहा है मगर बयान उनको छूकर निकल जाते हैं। तरकश में मौजूद घातक तीर तो सपा और भाजपा एक-दूसरे के खिलाफ ही इस्तेमाल कर रही है।
कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी के आक्रामक रवैया अपनाने के बाद प्रदेश कांग्रेस में उत्साह का संचार हुआ। कार्यकर्ताओं में जोश आया तो कांग्रेस एक बार फिर उत्तर प्रदेश में जनाधार हासिल करने की दिशा में बढ़ती दिखी। मगर हकीकत यह है कि जब-जब प्रियंका निकलती हैं तो कांग्रेस नेता और कार्यकर्ता सड़कों पर होते हैं।
मगर प्रियंका के वापस लौटने के साथ ही कार्यकर्ता भी शिथिल पड़ जाते हैं। ऐसे में तमाम घोषणाएं करने के बावजूद कांग्रेस से कोई बड़ा फायदा होना चमत्कार ही हो सकता है। उत्तर प्रदेश के साथ पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं लेकिन प्रियंका गांधी की तमाम घोषणाएं और चुनावी वादे सिर्फ उत्तर प्रदेश चुनाव पर ही सीमित हैं। ऐसे में कांग्रेस के चुनावी दावों पर जनता यकीन करने को तैयार नहीं है। वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एक के बाद एक पार्टी का हाथ छोड़ते जा रहे हैं। वहीं पंजाब कांग्रेस में पड़ी फूट, वरिष्ठ नेताओं के बयान भी पार्टी की छवि को खराब कर रहे हैं। वहीं प्रियंका के सक्रिय होते ही राहुल गांधी नेपथ्य में चले गये हैं। ऐसे में अकेली पड़ गयी प्रियंका के लिये कांग्रेस को अकेले संजीवनी दे पाना मुश्किल दिख रहा है।
बात करें बहुजन समाज पार्टी की तो बसपा मुखिया मायावती के तेवर भी पार्टी के भीतर मची बगावत से ढीले पड़ गये हैं। कुछ समय तक आक्रामक रवैया इख्तियार किये हुए मायावती सिर्फ ट्वीटर पर ही सक्रिय दिख रही हैं। जनता के बीच बसपा सुप्रीमो का मूवमेंट भाजपा-सपा के सामने न के बराबर है। ऐसे में बसपा इस विधानसभा चुनाव में कोई बड़ी चुनौती पैदा कर पायेगी यह सोचना भी मुश्किल लग रहा है।
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आम आदमी पार्टी और एआईएमआईएम उत्तर प्रदेश की राजनीति में जमीन तलाश रही हैं। आम आदमी पार्टी जनता के बीच कोई प्रभाव अब तक तो छोड़ पाने में नाकाम है। ओवैसी के नेतृृत्व में एआईएमआईएम जरूर प्रदेश में रैलियां कर रही है मगर पार्टी का फोकस सिर्फ मुस्लिम मतदाताओं पर है। ऐसे में वह सीटें तो जीतेगी मगर अकेले दम पर प्रदेश की राजनीति में बड़ा प्रभाव नहीं डाल पायेगी। वहीं राष्ट्रीय लोकदल, प्रगतिशील समाज पार्टी सहित अनेक दल सपा के साथ गठबंधन कर रहे हैं।
कुछ महीने पहले तक यूपी विधानसभा चुनाव भाजपा, सपा, कांग्रेस और बसपा के बीच चैतरफा मुकाबला दिखाई दे रहे थे। मगर अखिलेश यादव की सक्रियता और प्रदेश में भाजपा के शीर्ष नेताओं के आगमन ने मुकाबले को दो ध्रुवीय कर दिया है। भाजपा और सपा को भी एक-दूसरे पर सीधा निशाना साधने से वोटर सधते नजर आ रहे हैं। ऐसे में वह अन्य दलों पर ध्यान लगाकर समय बर्बाद करने की बजाये मुख्य प्रतिद्धंदी को ही निशाना बना रहे हैं। हाल ही में हुए चुनावी सर्वे में भी मुख्य मुकाबला सपा और भाजपा के बीच ही होने का दावा किया गया था।
चुनावी जंग में पल-पल बदलते पासों के बीच आने वाले दिनों में चुनाव का रूख किस ओर मुड़ जाये और कौन दल किस वक्त शिखर पर पहुंच जाये या किसकी उल्टी गिनती शुरू हो जाये यह कहना मुश्किल है। लेकिन मौजूद हालात में तो जीत का सेहरा भाजपा या सपा में से किसी एक की सिर पर बंधना तय है।

