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आगाज़ अगर ये है तो अंजाम खुदा जाने

आर्टिकल/इंटरव्यूआगाज़ अगर ये है तो अंजाम खुदा जाने

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अमित बिश्नोई
आगाज़ अगर ये है तो अंजाम खुदा जाने, ये बाद समाजवादी पार्टी के लिए इस लोकसभा चुनाव के लिए बिलकुल फिट बैठती है। वो इसलिए कि प्रत्याशियों के चयन को लेकर सपा प्रमुख इतने ज़्यादा कंफ्यूज हैं कि तय ही नहीं कर पा रहे हैं कि किसे चुनाव लड़ाया जाय और किसे नहीं। हालत ये है टिकट देने के बाद, नामांकन होने के बाद, पार्टी सिम्बल अलाट करने के बाद भी उम्मीदवारों को बदला जा रहा है. पहले चरण के नामांकन की प्रक्रिया समाप्त हो चुकी है और दूसरे चरण के लिए नामांकन का आज अंतिम दिन है लेकिन सपा में कन्फूज़न बिलकुल वैसा ही है जैसा पहले चरण के नामांकन के अंतिम दिन तक था। एक एक सीट से दो दो नामांकन, वो भी ज़बरदस्ती वाले नहीं, पार्टी की मर्ज़ी वाले। पहले दौर में जो हालत मुरादाबाद में थी वही स्थिति आज की तारीख तक मेरठ में है। मुरादाबाद में घोषित उम्मीदवार टी हसन नामांकन कर चुके थे मगर अंतिम दिन रुचिवीरा प्रत्याशी बन गयी और नामांकन किया। अब यही हालत मेरठ में है, अतुल प्रधान नामांकन कर चुके हैं और आज सुनीता वर्मा नामांकन करने वाली हैं।

दरअसल मेरठ सीट को लेकर सपा में शुरू से घमासान मचा हुआ है. लेकिन ये घमासान सपा का सिरदर्द तब बन गया जब भाजपा ने मेरठ से टीवी सीरियल रामायण वाले राम, मतलब अरुण गोविल को मैदान में उतार दिया। मेरठ में एडवोकेट भानुप्रताप को उम्मीदवार घोषित करने से पहले सरधना विधायक अतुल प्रधान और योगेश वर्मा (मौजूदा प्रत्याशी सुनीता वर्मा के पति) के बीच टिकट को लेकर काफी घमासान मचा हुआ था. अतुल प्रधान जहाँ अखिलेश यादव के काफी करीबी माने जाते हैं वहीँ योगेश वर्मा क्षेत्र के मज़बूत जनाधार वाले नेताओं में जाने जाते हैं। आपसी प्रतिद्वंदिता के कारण दोनों के बीच भानुप्रताप को लेकर एक राय बनी. यही वजह है कि मेरठ से सबसे पहले सपा ने ही प्रत्याशी की घोषणा की, लेकिन अरुण गोविल का नाम सामने आने के बाद सपा के लिए सारी परिस्थितियां प्रतिकूल हो गयीं और फिर मजबूरन अतुल प्रधान को उम्मीदवार घोषित हो गया.

यहाँ से मामला और बिगड़ा और कहा जाने लगा कि योगेश वर्मा ने अतुल प्रधान का समर्थन न करने का फैसला किया है. वैसे भी भानुप्रताप के बाद योगेश वर्मा का नाम ही सामने आया था और ये माना जा रहा था कि योगेश वर्मा ही प्रत्याशी होंगे लेकिन जब अतुल प्रधान के नाम की घोषणा हुई तो लोगों को हैरानी भी हुई. अंदरखाने की बात करें तो मामला लगातार बिगड़ रहा था, स्थानीय स्तर पर भी योगेश को अतुल प्रधान से ज़्यादा समर्थन मिल रहा था. उसपर योगेश वर्मा की चेतावनी ने अखिलेश का सिरदर्द और बढ़ा दिया। अब अखिलेश ने कैसे सुनीता वर्मा के लिए अतुल प्रधान को मनाया ये एक सवाल है, वैसे कहा जा रहा है कि योगेश को मनाने की जगह अतुल प्रधान को हैंडल करने में अखिलेश को ज़्यादा आसानी रही, हालाँकि यहाँ पर भी कहीं न कहीं ये शर्त ज़रूर रही होगी कि योगेश वर्मा सीधे चुनाव नहीं लड़ेंगे और शायद इसी लिए उनकी पत्नी सुनीता को उम्मीदवार घोषित किया गया ताकि अहम की लड़ाई भी थोड़ी शांत हो और बीच का रास्ता निकाला जाय.

वैसे अतुल प्रधान की नाराज़गी दूर हुई या नहीं ये तो नहीं पता लेकिन उन्होंने सोशल मीडिया पर एक सन्देश ज़रूर दिया है कि पार्टी अध्यक्ष के हर फैसले का स्वागत है। हालाँकि जब ये खबर आयी थी कि सपा एक बार फिर मेरठ से उम्मीदवार बदलने जा रही थी तो अतुल प्रधान की तरफ से कहा गया था कि अगर ऐसा हुआ तो वो विधायकी से भी इस्तीफ़ा दे देंगे। मगर अब उनके संदेश से लगता है कि उन्हें मनाने में अखिलेश यादव कामयाब हो गए हैं। मेरठ की सीट पर इस कन्फ्यूज़न के बीच सपा का चुनावी हश्र क्या होगा ये तो 4 जून को ही पता चलेगा लेकिन सपा में जिस तरह उम्मीदवारों को बदला जा रहा है वो किसी भी पार्टी के लिए ठीक नहीं है. सपा अबतक आठ सीटों पर उम्मीदवार बदल चुकी, मेरठ में तो तीन बार ये हुआ, ऐसा ही गौतमबुद्धनगर में हुआ. अखिलेश के पुराने साथी जयंत चौधरी ने सपा के इस रवैये पर मज़ेदार चुटकी ली है, हालाँकि उन्होंने सपा का नाम नहीं लिया। जयंत ने कहा कि नसीब वाले हैं वो जिनका टिकट नहीं कटा. बात भी सही है, जयंत की चुटकी राजनीतिक हो सकती है लेकिन सच्चाई के काफी करीब है, सपा के इस रवैये पर तो उसका हर प्रत्याशी इसी कन्फ्यूज़न में रहेगा कि नामांकन करूँ या न करूँ, पता नहीं कब टिकट कट जाय. वैसे जो रवैया सपा में चल रहा है उसे देखकर यही कहा जा सकता है मेरठ तो एक ट्रेलर है, पिक्चर तो अभी पूरी बाकी है.

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