- इंडियन स्ट्रोक एसोसिएशन के अनुसार भारत में स्ट्रोक का खतरा सौ प्रतिशत तक बढ़ा
- गोल्डन पीरियड में उपयुक्त उपचार न मिल पाने के कारण विकलांगता और मृत्यु होने का खतरा
न्यूज़ डेस्क । भारत में स्ट्रोक या ब्रेन अटैक मृत्यु और विकलांगता की एक मुख्य वजह बनती जा रही है। जीवनशैली में आये बदलाव के कारण युवा वर्ग भी स्ट्रोक का शिकार हो रहा है। इंडियन स्ट्रोक एसोसिएशन के अनुसार भारत में स्ट्रोक का खतरा सौ प्रतिशत तक बढ़ गया है।
कार्डियक अटैक की स्थिति की तरह ही अगर ब्रेन स्ट्रोक पड़ने पर रोगी को गोल्डन पीरियड कहलाने वाले चार घंटे के भीतर सही इलाज मिल जाए तो उसे 100 प्रतिशत ठीक करना संभव है। मगर जागरूकता के अभाव में लोग इस गोल्डन पीरियड में उपयुक्त उपचार नहीं ले पाते जिसके कारण उनको विकलांग होने से लेकर मृत्यु तक के खतरे का सामना करना पड़ता है।
पिछले कुछ दशकों के दौरान स्ट्रोक के मामलों में 100 प्रतिशत बढ़ोतरी होने के बावजूद सरकार द्वारा कार्डियोवैस्कुलर, डायबिटीज, हाइपरटेंशन जैसी अन्य गैर-संक्रामक बीमारियों की तरह लोगों को जागरूक नहीं किया जा रहा। जिसके कारण यह गंभीर समस्या बनता जा रहा है।
ब्रेन स्ट्रोक में रक्त आपूर्ति बाधित होने से मस्तिष्क को नुकसान पहुंचता है। स्ट्रोक के लक्षण में चलने, बोलने और समझने में मुश्किल होने के साथ ही लकवा मारना या चेहरे, हाथ या पैर में सुन्नपन होना शामिल है। ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज स्टडी 2013 के अनुसार, 2.57 करोड़ लोग स्ट्रोक से उबर गए, 65 लाख लोगों की मौत हुई और स्ट्रोक के 1.03 करोड़ नए मामले दर्ज किए गए थे। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि भारत में ब्रेन स्ट्रोक की समस्या कितनी गंभीर हो चुकी है।
स्ट्रोक मैनेजमेंट के लिए थ्रोम्बोलाइसिस है न्यूरोलाॅजिस्ट्स की पहली पसंद
इंस्टीट्यूट ऑफ ब्रेन ऐंड स्पाइन के प्रतिष्ठित ब्रेन ऐंड स्पाइन सर्जन व मैनेजिंग डायरेक्टर डाॅ. सचिन कांधारी के अनुसार, भारत में स्ट्रोक के कारण होने वाली मौतों की संख्या में करीब 100 प्रतिशत की बढ़ोतरी को देखते हुए त्वरित व समग्र इलाज समाधान उपलब्ध कराना समय की मांग बन गई है। स्ट्रोक मैनेजमेंट के लिए थ्रोम्बोलाइसिस एक गेम चेंजर साबित हो सकता है और ऐसे में बहुत महत्वपूर्ण है कि हमारे पास अधिक से अधिक संख्या में ऐसे हाॅस्पिटल्स हों जो स्ट्रोक के रोगियों को संपूर्ण देखभाल और ऐंड-टु-ऐंड साॅल्यूशंस उपलब्ध कराएं। अगर रोगी को स्ट्रोक पड़ने के एक घंटे के भीतर सेंटर तक लाया जाता है तो जानलेवा स्थिति से रोगी को बचाने के लिए न्यूरोलाॅजिस्ट्स की पहली पसंद थ्रोम्बोलाइसिस ही होता है और वह भी जितनी जल्दी संभव हो सके। इससे रक्त प्रवाह बेहतर होता है जिससे कोशिकाओं व अन्य अंगों को होने वाले नुकसान को रोका जाता है।
डाॅ. किशन राज, सीनियर कंसल्टेंट न्यूरोलाॅजी, आईबीएस हाॅस्पिटल और थ्रोम्बोलाइटिक थेरेपी विशेषज्ञ ने बताया, स्ट्रोक होने पर तुरंत प्री-हाॅस्पिटल देखभाल, केंद्रित स्ट्रोक सेवाओं, समग्र थ्रोम्बोलाइसिस इलाज और स्ट्रोक के लिए समग्र रिहैबिलिटेशन सेवाओं का उपलब्ध होना आवश्यक है। मगर ऐसे सेंटरों की संख्या बहुत कम होने के कारण ऐसे मरीजों की जान को भी खतरा होता है।
संगठित रिहैबिलिटेशन सर्विसेज को किफायती बनाना आवश्यक
स्ट्रोक्स के कारण स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव कोे कम करने के लिए संगठित रिहैबिलिटेशन सर्विसेज को किफायती कीमत पर आसानी से लोगों को उपलब्ध कराने की आवश्यकता है। सेकेंडरी दवाओं को किफायती बनाकर परिवारों पर पड़ने वाला इस बीमारी का बोझ कम किया जाना चाहिये।। गोल्डन ऑवर के महत्व के बारे में बढ़ती जागरूकता, फ्रंटलाइन हेल्थकेयर इकोसिस्टम के अपग्रेड होने और भारतीय संदर्भ में इंटीग्रेटेड स्ट्रोक रणनीति बनाना जरूरी है। अ भारत में स्ट्रोक बीमारी को रोकने के लिए सरकार और निजी क्षेत्र की एक संयुक्त कोशिश की आवश्यकता है जिसमें दोनों मिलकर स्ट्रोक्स को रोकने का हरसंभव प्रयास करने की दिशा में काम करें।

