बिहार और उत्तर पूर्वी राज्यों में बड़े ही धूमधाम से छठ पर्व मनाया जाता है। कार्तिक महीने की षष्ठी तिथि से ही इस पर्व की शुरूआत हो जाती है। जो कि अगले चार दिनों तक चलती है। चौथे दिन सूर्योदय के साथ छठ पर्व का समापन हो जाता है। इस दौरान महिलाएं सूर्य भगवान को अर्घ्य देकर छठ मइया की पूजा करती हैं। इस पर्व की अनेक पौराणिक मान्यताएं हैं। जिनके बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी है। तो चलिए जानें छठ पर्व से जुड़ी पौराणिक कथाएं और किवदंतियां।

नहाय-खाय से शुरू होने वाले इस पर्व की अनेक पौराणिक कथाएं हैं। जिसमें से एक है कर्ण के विषय में, महाभारत काल में कर्ण भगवान सूर्य के अनन्य भक्त थे। वो पानी में खड़े होकर घंटों सूर्य की उपासन किया करते थे। जिससे प्रसन्न होकर भगवान सूर्य ने कर्ण को महान योद्धा बनने का आशीर्वाद दिया था। वहीं एक दूसरी महाभारत काल की कथा के अनुसार जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गए थे तब द्रौपदी ने इस चार दिनों के व्रत को किया था। इस पर्व पर भगवान सूर्य की उपासना की थी और मनोकामना में अपना राजपाट वापस मांगा था।
किंवदंती के अनुसार, ऐतिहासिक नगरी मुंगेर के सीता चरण में कभी मां सीता ने छह दिनों तक रह कर छठ पूजा की थी। पौराणिक कथाओं के अनुसार 14 वर्ष वनवास के बाद जब भगवान राम अयोध्या लौटे थे तो रावण वध के पाप से मुक्त होने के लिए ऋषि-मुनियों के आदेश पर राजसूय यज्ञ करने का फैसला लिया। इसके लिए मुग्दल ऋषि को आमंत्रण दिया गया था, लेकिन मुग्दल ऋषि ने भगवान राम एवं सीता को अपने ही आश्रम में आने का आदेश दिया। ऋषि की आज्ञा पर भगवान राम एवं सीता स्वयं यहां आए और उन्हें इसकी पूजा के बारे में बताया गया। मुग्दल ऋषि ने मां सीता को गंगा छिड़क कर पवित्र किया एवं कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष षष्ठी तिथि को सूर्यदेव की उपासना करने का आदेश दिया। यहीं रह कर माता सीता ने छह दिनों तक सूर्यदेव भगवान की पूजा की थी।
छठ पर्व को लेकर एक मान्यता है कि इसी दिन मां गायत्री का जन्म हुआ था। छठ पर्व की उपासना सूर्य की उपासना का त्योहार है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि सूर्यदेव की पूजा करने से व्रत करने वालों को सुख, सौभाग्य और समृद्घि की प्राप्ति होती है। इस दिन किसी नदी या तालाब में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।

