ज़ीनत सिद्दीक़ी

कहते हैं लाशें बोलती हैं और उन्हें कभी चुप नहीं कराया जा सकता। भारत में आजकल यही हो रहा है. कोरोना महामारी की दूसरी लहर ने जो तांडव मचाया उसने सबके रौंगटे खड़े कर दिए. क़ब्रिस्तानों और शमशानों के जो भयावह दृश्य सामने आये वह बेहद डरावने थे, अगर प्रधानमंत्री मोदी जी की भाषा में कहें तो अकल्पनीय थे. एक तरफ जहाँ कोरोना संक्रमण के मामले द्रुत गति से आगे बढ़ रहे थे वहीँ मौतों की गिनती करना मुश्किल हो रही थी. इन सबके बीच मौतों के आंकड़ों में हेराफेरी की बातें सामने आने लगीं जिसने सरकार को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया।
मौतों के आंकड़ों में हेराफेरी के आरोप तो कोरोना की पहली लहर के दौरान ही वह देश लगाने लगे थे जहाँ आबादी कम होने के बावजूद कोरोना से मृत्यु दर अधिक थी, इस तरह की पहली शंका तो मोदी जी के अभिन्न मित्र डोनाल्ड ट्रम्प ने ज़ाहिर की थी, इंटरनेशनल मीडिया भी लगातार इस बात को लेकर संदेह जता रहा था कि भारत कोरोना से होने वाली मौतों को छुपा रहा है, भारत ने उस समय भी ऐसे तमाम आरोपों को निराधार बताया था. मगर कोरोना की दूसरी लहर के तांडव मचाने के बाद मौतों के आंकड़ों को छुपाने की बात और ज़ोर पकड़ने लगी. इस मामले में गुजरात के कई अख़बारों ने बड़े ही तार्किक ढंग से इस घोटाले का पर्दा फाश किया कि किस तरह गुजरात सरकार कोरोना से होने वाली मौतों की संख्या बहुत कम बता रही है. रोज़ाना शमशान में जलने वाली चिताओं और सरकार द्वारा जारी कोरोना मौतों के आंकड़ों में भारी अंतर दिखने लगा, जारी मृत्यु प्रमाणपत्रों और सरकारी कोरोना मौतों के आंकड़ों में एक लम्बा अंतर सामने आने लगा जिसने इस बात को बल दिया किया कि आरोप निराधार नहीं हैं. गुजरात जैसे घपले बिहार, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, गोवा, कर्नाटक व अन्य राज्यों में सामने आने लगे.
मामले ने तूल पकड़ना शुरू किया तो सर्वे किये जाने लगे, देश में भी और विदेशों में भी. इन सभी सर्वे में यह बात साफ़ तौर पर निकलकर आयी कि भारत में कोरोना से मौतों की संख्या जितनी बताई जा रही है उससे छः सात गुना ज़्यादा मौतें हुई हैं, न्यू यार्क टाइम्स ने इस पर बाकायदा एक रिपोर्ट छापी और भारत में 42 लाख लोगों की कोरोना से होने वाली मौतों का अनुमान लगाया, यहीं नहीं रिपोर्ट में 70 करोड़ लोगों के संक्रमित होने की आशंका भी जताई. ज़ाहिर सी बात है, डिनायल मोड में हमेशा रहने वाली मोदी सरकार ने इन सभी ख़बरों को निराधार, भ्रामक और भारत को बदनाम करने वाली बताया।
संयोग देखिये कि इन आरोपों की पहली पुष्टि भाजपा शासित बिहार राज्य से हुई जब उच्च न्यायालय द्वारा सख्ती दिखाने के बाद जांच करवाई गयी और चार हज़ार मौतों को आंकड़ों में और जोड़ा गया और अब यह सिलसिला शुरू हो चूका है, बैकलॉग के नाम पर थोड़ा थोड़ा करके कोरोना मृतकों को आंकड़ों में जोड़ा जा रहा है. सरकार की यह नयी पालिसी भी इस बात को साबित करती है कि मौतों को छिपाने के आरोपों में दम है. एम्स के डायरेक्टर रणदीप गुलेरिया का यह बयान कि प्राइवेट अस्पताल और राज्य सरकारें कोरोना से होने वाली मौतों के आंकड़ों को ऑडिट कराए, अपने आप में एक सवाल खड़ा कर रहा है.
एक और बात जो सरकार और सत्ताधारी नेताओं द्वारा ज़्यादा मौतों के बारे में कही जा रही है. ज़्यादा मौतों पर इनका तर्क है कि यह सारी मौतें कोरोना से नहीं हुई हैं बल्कि अन्य बहुत से कारणों से हुई हैं. इन लोगों का यह तर्क तो और भी बड़ा सवाल खड़ा करता है कि ऐसा क्या हुआ कि अप्रैल और मई के महीने में पिछले साल की तुलना में मौतों का आंकड़ा कई गुना बढ़ गया? अगर यह मौतें कोरोना के कारण नहीं हुई हैं तो किन कारणों से हुई हैं, क्या कोई और महामारी फैल चुकी है जिसका सरकार और उसके विशेषज्ञों को पता नहीं? क्या मौतों के इन अदृश्य कारणों के जांच की ज़रुरत नहीं है.
बचपन से सुनते आये हैं कि छुपाने से मर्ज़ बढ़ता है. इसलिए सरकार को छुपाने की जगह बताने का फार्मूला अपनाना चाहिए ताकि सच्चा और सटीक आंकलन करके सही योजना बनाई जा सके और आने वाले खतरों (तीसरी लहर) से निपटने के लिए ठोस क़दम उठाये जा सकें। सरकार को एक बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि कोरोना के मामलों के आंकड़ों को भले ही छुपाया जा सकता हो मगर मौतों को किसी भी तरह नहीं छुपाया जा सकता, इसलिए इन कामों में अपनी ऊर्जा बर्बाद करने और बदनामी मोल लेने से अच्छा है कि पारदर्शिता अपनाये और हक़ीक़त से मुंह न मोड़कर सही दिशा में काम करे. एक बात और जनता बहुत कुछ माफ़ कर सकती है मगर किसी अपने की उन हालातों में मौत कभी नहीं बर्दाश्त कर सकती जो सरकार की लापरवाही और अदूरदर्शी फैसलों के कारण बने थे और अभी हैं.

