सरकारी मशीनरी एक ही काम कर सकती है। या तो ये कोरोना के कहर से प्रदेशवासियों को बचाने का प्रयास कर सकती है या फिर ये पंचायत चुनाव की ड्यूटी निभा सकती है। इतने जटिल दोनों काम एक ही वक्त में कर पाना असंभव हैं।
उत्तर प्रदेश में तेज़ी से फैल रहे कोरोना संक्रमण की रोकथाम ज़रूरी है या इस नाजुक हालात में चुनाव करवाना ज़रूरी है ? ये प्रश्न किसी के भी सामने रख कर देख लिजिए, हर कोई यही जवाब देगा कि कोरोना के क़हर से ज़िन्दगी बचाना ही पहली प्राथमिकता होना चाहिए है। कोई विक्षिप्त ही होगा जो कहेगा कि कोविड के कहर में भी चुनाव होना चाहिए है। भीड़भाड़ और कतारों के बिना पंचायत चुनाव की कल्पना भी करना मुश्किल है। और यदि कोविड प्रोटोकॉल और धारा 144 के साये में चुनाव करवाया जाएगा तो मान लीजिए कि करीब एक महीने प्रशासन और सरकारी अमले/कर्मचारियों को चुनावी प्रक्रिया और सख्त नियमों का पालन करवाने की मुश्तैदी के लिए लगवाया जाएगा।
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हर जिले के जिला प्रशासन, सुरक्षा बलों और सरकारी कर्मचारियों को दिनों रात चुनावी ड्यूटी में लगाया जाएगा। ये ड्यूटी इसलिए भी सख्त होगी क्योंकि ये चुनाव बहुत चुनौतीपूर्ण होंगे। तेरह करोड़ लोगों और हजारों प्रत्याशियों पर सख्त निगरानी रखी जानी है कि इतनी बड़ी आबादी कोरोना से बचाव की गाइड लाइन का पूरा पालन करे। सोशल डिस्टेंसिंग, सेनीटाइज़र, हाथ धोना, भीड़ ना लगाना और कतारों में ना लगना.. इन हिदायतों के साथ ही इतनी बड़ी ग्रामीण आबादी को चुनवी अनुष्ठान में शामिल होना है।
ये तब संभव होगा जब प्रदेश का जिला प्रशासन, सुरक्षा कर्मी और और लाखों सरकारी कर्मचारी पूरी जिम्मेदारी से अपना फर्ज निभाएंगे। और यही सरकारी मशीनरी यूपी म़े बढ़ रहे जानलेवा संक्रमण कोरोना से बचाव के लिए काम आती है। अब जब कोरोना और चुनाव दोनों आमने सामने हैं तो सरकारी मशीनरी कोरोना से लड़ाई का महत्वपूर्ण काम करेगी या धारा 144 के साये में पंचायती चुनाव करवाने के जटिल काम में अपनी ऊर्जा लगाएगी ?
- नवेद शिकोह

