बुधवार (15 दिसंबर) को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने महिलाओं के लिए शादी की कानूनी उम्र 18 से बढ़ाकर 21 साल करने का फैसला लिया। हालांकि, पुरुषों के लिए शादी की कानूनी उम्र 21 साल ही है। इस फैसले के पारित होने से भारत में पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए शादी की कानूनी उम्र बराबर हो जाएगी।
इस फैसले से एक सामाजिक क्रांति की शुरुआत हो सकती है क्योकि इस नए फैसले से काफी तरह के सामाजिक परिवर्तन होंगे और यह डिबेट का एक बड़ा मुद्दा बन सकता है।
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कैबिनेट की मंजूरी के बाद, सरकार बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 में एक संशोधन पेश कर सकती है, और इसके परिणामस्वरूप विशेष विवाह अधिनियम और व्यक्तिगत कानूनों जैसे हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 में संशोधन हो सकता है।
पिछले साल अगस्त स्वतंत्रता दिवस के भाषण में, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने इस प्रस्ताव का उल्लेख किया था और कहा था कि सरकार “बेटियों और बहनों के स्वास्थ्य के बारे में लगातार चिंतित है”। इसके साथ-साथ प्रधानमंत्री ने कहा था कि बेटियों को कुपोषण से बचाने का एकमात्र उपाय उनकी शादी सही उम्र में करना है।
शादी के लिए न्यूनतम उम्र क्यों है जरूरी?
कानून द्वारा विवाह की एक न्यूनतम आयु निर्धारित है जिसका मुख्य उद्देश्य बाल विवाह और नाबालिगों के साथ दुर्व्यवहार को रोकना और गैरकानूनी घोषित करना है।
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विभिन्न धर्मों में विवाह से संबंधित अपने अलग प्रथा होते हैं। हिंदुओं में और हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत दुल्हन के लिए शादी की न्यूनतम आयु 18 वर्ष है बल्कि दूल्हे के लिए न्यूनतम आयु 21 वर्ष है। जबकि, इस्लाम में, युवावस्था प्राप्त कर चुके नाबालिग की शादी वैध मानी जाती है।

