एहसान फरामोशी या आज़ादी

आर्टिकल/इंटरव्यूएहसान फरामोशी या आज़ादी

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कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष जब विदेश में अपना इलाज करा रही हैं ऐसे मौके को गाँधी फैमिली पर आरोपों की भरमार करके 42 वर्षों का साथ छोड़ने को क्या कहा जा सकता है, एहसानफरामोशी या आज़ादी? कांग्रेस पार्टी में चार दशकों से भी ज़्यादा हमेशा पद पर बैठकर राजनीति करने वाले बागी G-23 ग्रुप के नेता गुलामनबी आज़ाद ने पार्टी का साथ छोड़ दिया। कांग्रेस पार्टी से नेताओं का इस्तीफ़ा देना कोई हैरानी वाली बात नहीं और आज़ाद के इस्तीफे से भी किसी को आश्चर्य नहीं लेकिन इतने वरिष्ठ नेता ने जिस तरह से पार्टी को छोड़ा है, हैरानी उसपर है. हैरानी इस्तीफे की टाइमिंग पर भी है. आप जिन लोगों पर आरोप लगा रहे हैं वह इस वक्त भारत में नहीं हैं, राहुल अपनी माँ का इलाज करवाने विदेश गए हुए हैं. आज़ाद को इस्तीफ़ा देना अगर इतना ज़रूरी लग रहा था तो कुछ दिन और रुक सकते थे, कुछ दिन और घुटन बर्दाश्त कर सकते थे. अच्छा होता कि आज़ाद सोनिया और राहुल की आँखों में आँख डालकर अपना इस्तीफ़ा सौंपते। यह मुंह चोरी क्यों? दिल में क्या खोट थी? 

आज़ाद ने सोनिया गाँधी के नाम लम्बा चौड़ा खत तो लिख दिया। कांग्रेस की बर्बादी की वजह भी बता दी, पार्टी के फिर कभी खड़ी न होने की बद्दुआ भी दे दी. मगर जिसने भी आज़ाद के खत का मज़मून पढ़ा मुंह से एक शब्द निकला “एहसानफरामोश”. आज़ाद की इस हरकत पर यह शब्द बिलकुल सही भी बैठता है. आज़ाद ने अपने पत्र में चाटुकारिता की बात कही, लेकिन यह आरोप लगाने से पहले वो भूल गए कि संजय गाँधी के सबसे बड़े चाटुकारों में उनका नाम लिया जाता था. उस समय भी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता संजय गाँधी और उनकी टीम के फैसलों से आहत थे, नाराज़ थे. आज जब राहुल गाँधी अपनी नई टीम के साथ काम कर रहे हैं तो GNA को रणदीप सुरजेवाला, अजय माकन, के सी वेणुगोपाल जैसे राहुल गाँधी के करीबी चाटुकार नज़र आते हैं. 

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आज़ाद को परेशानी है कि कांग्रेस में अब उनका सम्मान नहीं होता, उनके कद के हिसाब से उनको उनको पद नहीं दिया जाता। यह बात कहने से पहले वो भूल गए कि उनका नाम कांग्रेस के उन नेताओं में शामिल है जो पद के बिना कभी रहे ही नहीं, फिर वो चाहे सरकार में हो या फिर संगठन में. और कितना सम्मान चाहिए आपको। प्रधानमंत्री तो कभी आप बन नहीं सकते, हाँ अगर पार्टी अध्यक्ष बनने की तमन्ना थी तो कांग्रेस से भागने से पहले थोड़ा रुक जाते और पार्टी अध्यक्ष के लिए अगले महीने होने वाले चुनाव में अपनी दबी हुई इच्छा को पूरा कर लेते। दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता, आपको भी पता चल जाता कि आपकी क्या हैसियत है.

आपने पार्टी के नाराज़ वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं को इकठ्ठा कर एक अलग ग्रुप खड़ा कर दिया, यह आपकी अनुशासनहीनता नहीं तो और क्या है. सभी जानते हैं कि यह ग्रुप पार्टी आलाकमान या कह सकते हैं कि गाँधी फैमिली पर दबाव बनाने के लिए बनाया गया था ताकि मलाई खाने का सिलसिला जारी रहे और जब आपको लगा कि राहुल गाँधी के रहते अब यह संभव नहीं तो पार्टी में रहकर बग़ावत की बातें। आज़ाद साहब आप अगर किसी और पार्टी में होते तो कब का बाहर कर दिए गए होते लेकिन यह तो कांग्रेस पार्टी का कल्चर है जिसने आपके खिलाफ कभी कार्रवाई नहीं होने दी. कांग्रेस पार्टी आज राजनीतिक रूप से कहीं भी खड़ी हो यह एक अलग विषय है लेकिन उसने अपने वरिष्ठ नेताओं का हमेशा सम्मान किया, उनके लिए कभी मार्गदर्शक मंडल नहीं बनाया और न ही कोई आयु सीमा तय की. अब आपको जम्मू कश्मीर में चुनाव समिति का अध्यक्ष बनाकर एक बड़ी ज़िम्मेदारी दी लेकिन आप जैसे कांग्रेसियों ने कभी ज़िम्मेदारी उठाई ही नहीं।

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कांग्रेस पार्टी ने आपको सबकुछ दिया लेकिन आपका मन नहीं भरा, आपने कहा कि कांग्रेस अब दोबारा खड़ी नहीं हो सकती और आपकी यही बात आपकी बदनीयती को साबित करती है. आपके खत के मज़मून ने साबित कर दिया कि आप सत्ता के बिना रह नहीं सकते। जम्मू कश्मीर में नई पार्टी बनाकर वहां सियासत शुरू करने का आपने इरादा ज़ाहिर कर दिया। इरादे तो खैर आपके पहले से ही ज़ाहिर हो गए थे, उसपर मुहर आपने 26 अगस्त 2022 को लगाई। शायद भाजपा को जम्मू कश्मीर में एक और पीडीपी की ज़रुरत है. देर सवेर वहां चुनाव होने ही हैं ऐसे में भाजपा को चुनाव से पहले या फिर चुनाव के बाद किसी पीडीपी के सहारे की ज़रुरत तो पड़ेगी ही, हो सकता है आपका कांग्रेस पार्टी से इस्तीफ़ा जम्मू कश्मीर की नई पीडीपी बनने के लिए किया गया हो. वैसे भी संसद के अंदर और संसद के बाहर भाजपा और आपके बीच काफी नज़दीकी रिश्ता रहा है. प्रधानमंत्री मोदी संसद में कई बार रोये हैं, आपके लिए भी. आपकी विरोधी पार्टी का प्रधानमंत्री आपके लिए संसद में आंसू बहाये तो कुछ तो याराना ज़रूर रहा होगा। आज़ाद साहब आप याराना निभाइये मगर जिसने आपको इस काबिल बनाया कि एक पीएम आपके लिए देश की संसद में भावुक हो जाय, उसके ऊपर इस तरह के आरोप तो मत लगाइये। पार्टी तो आपके ही ग्रुप के कपिल सिब्बल ने भी छोड़ी थी मगर आपमें और सिब्बल के कांग्रेस पार्टी को छोड़ने में बहुत अंतर है. आज़ाद साहब आपकी नई मित्रमंडली कह रही है कि आज़ाद कांग्रेस की गुलामी से आज़ाद हो गए मगर मेरे हिसाब से शायद कांग्रेस को एक गुलाम मानसिकता वाले नेता से आज़ादी मिल गयी.

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