अनूप मणि त्रिपाठी

दद्दा दनदनाते हुए कमरे में आए। मन उनका खट्टा था। नहीं तो आते ही उनका पहला संवाद यह होता ‘का हाल है बच्चा!’
‘दद्दा इस समय! मैंने पूछा।
‘क्यों कोई दिक्कत!’ सोफे पर बैठते ही दद्दा बोले।
‘नहीं ऐसी कोई बात नहीं! चुनाव का समय है न!’
‘अरे काहे का चुनाव!’ दद्दा का यह ढंग मुझे अप्रत्याशित लगा।
‘क्या बात है दद्दा! सब ठीक तो है!’
‘टिकट कट गया!’ दद्दा किसी तरह से बोले।
‘ओह! तभी दद्दा पर कटे पक्षी की तरह फड़फड़ा रहे हैं!’ अब जाकर बात खुली। दद्दा पार्टी के पुराने कार्यकर्ता हैं। पार्टी के लिए पूरी तरह से समर्पित। पार्टी को ही वह देश समझते हैं और आलाकमान के भाषणों को ही अध्यादेश।
‘ये तो बहुत नाइंसाफी है! टिकट तो आपको ही मिलना चाहिए था!’ मैंने दद्दा की उम्मीदवारी का समर्थन किया। पर दद्दा ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
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‘किसको मिला!’ मैंने दद्दा से पूछा।
‘उसी हत्यारे को!’ दद्दा दन्न से बोले।
मैं समझ गया दद्दा किसकी ओर इशारा कर रहे थे। दद्दा ने बेशक हत्यारा कहा, मगर कानून की भाषा में उनके ‘टिकटकटवा’ को हत्यारा नहीं कहा जा सकता था। कोर्ट में उसका मुकदमा अभी चल रहा था।
‘बाहुबली तो आप भी हैं!’ मैंने दद्दा का मनोबल बढ़ाया।
‘हाँ,मगर हमारे ऊपर केस कम है!’ दद्दा उदास होकर बोले।
‘फिर वह गाँठ से पूरा होगा!’
‘तो क्या हम भिखारी हैं!’ दद्दा आक्रमक होकर बोले।
‘वह बोलता तो धांसू हैं!’
‘तो क्या हम मिमियाते हैं। भूल गए पाटा नाला और नाका…’
मैं ठीक-ठीक समझने की कोशिश कर रहा था कि दद्दा की किरपा कहाँ रुकी हुई थी। पर दद्दा अक्रामक हो रहे थे।
‘नहीं दद्दा कैसे भूल सकता हूँ,सवाल ही नहीं उठता! आपके भाषण के बाद यहीं तो बलवा हुआ था…’
यह सुनते ही दद्दा का बुझा हुआ चेहरा कुछ रोशन हुआ।
‘आपने फिर आला कमान की परिक्रमा नहीं की होगी!’ मैंने असल बात का सिरा पकड़ने की कोशिश की।
‘क्या बकलोली कर रहे हो तब से!’ दद्दा अचानक भड़के। ‘सर से पाँव तक पॉलिटिक्स में धँसा हूँ!’ दद्दा के तेवर देख मेरी घिघी बँध गयी।
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‘अब तुम हमें सिखाओगे कि पॉलिटिक्स कैसे की जाए!’
‘नहीं दद्दा!’ मैं हिचकिचाते हुए बोला।
‘मक्खन, तेल, साबुन,पानी,खून,पसीना…लाठी छुरी,तमंचा, जात, धरम, बिरादरी सब लगा दिया। परिक्रमा से पराक्रम तक कुछ नहीं छोड़ा, मगर मानना पड़ेगा टिकटकटुवा को!’ दद्दा सोफे से उठे और कुछ दूर चलने के बाद वापस आकर फिर बैठ गए।
‘मुझे तो अभी भी यकीन नहीं हो रहा दद्दा कि आपको टिकट नहीं मिला!’
‘यार अब तुम्हें अब क्या बताए!’ दद्दा अपनी दाढ़ी खुजाते हुए बोले।
‘बताइए न दद्दा! बताने से दिल का बोझ हल्का हो जाएगा!’ मैंने दद्दा को सांत्वना दी।
‘बोझ क्या हल्का होगा… फिर भी सुनो!’ दद्दा सोफे से उठे और कमरे में टहलने लगे।थोड़ी देर वह अनमने से रहे। उसके बाद दद्दा ने अपनी कहानी सुनाई…
तुम्हें बताए कि हमारे आलाकमान को पान खाने के बहुत शौकीन हैं। यह बात हम भी जानते थे,मगर यह नहीं जानते थे कि हमारे टिकट के रास्ते में यह पहाड़ बन कर खडा होगा! चुनाव का साल आते ही हम अपने क्षेत्र में काम कर रहे थे और टिकट के लिए जान लड़ा रहे थे। फिर हमारे सूत्रों ने हमें बताया कि हमारा प्रतिद्वंदी रोज आलाकमान को पान की सप्लाई करता है। फिर क्या था… अगले दिन हम पान लेकर आलाकमान के दरबार में हाजिर हो गए। हम वहाँ क्या देखते हैं कि दद्दनवा पहले से बैठा हुआ है और आलाकमान पान चबा रहे हैं। हमने हिम्मत करके उनकी तरफ अपना पान बढ़ाया तो दद्दनवा जोर से हँसा और बोला,’यह कौन सा पान खिला रहे हो!’ हम सकपका गए। दद्दनवा आगे अकड़ कर बोला,’आलाकमान ऐसा पान नहीं खाते हैं…’ अब काटो तो खून नहीं। हमने अपने को खूब धिक्कारा! जमीन से जुड़े मुद्दे को पकड़ने में हमसे चूक कैसे हो गई! दरबार से निकलते ही अगले ही पल हमने सब पता कर लिया। आलाकमान किस दुकान से पान खाते हैं। उनके पान में क्या-क्या पड़ता है। हेन-तेन सब! फिर क्या था! अगले दिन हम भी उसी दुकान से उनके पसंद का पान बनवा के पहुँच गए। इस बार हम बहुत खुश हुए कि आलाकमान हमारा लाया हुआ पान खा रहे थे और दद्दनवा बैठा जल रहा था। इधर आलाकमान के होंठ लाल हो रहे थे,तो उधर दद्दनवा का मुँह। गुरु कसम से! उस वक्त हमको बहुत मौज आ रही थी! फिर आलाकमान को पीक निस्तारण की तलब हुई। हम क्या देखते हैं कि दद्दनवा लपक कर पीकदान उठा लाया और आलाकमान के मुँह से सटा दिया। यह देखकर हम थूक सटक लिए। बेशक पान हम लाए थे,मगर एक बार फिर दद्दनवा बाजी मार ले गया। स्याला हम फिर पिछड़ गए…
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दद्दा टहलते हुए फिर सोफे पर बैठ गए। थोड़ी देर चुप रहे।
फिर बोले…
हम एक बार फिर पान लेकर आलाकमान के घर पहुँचे। इस बार हमने तय किया,चाहे जो हो, पीकदान उठाने में हमारा ही अवदान होगा। आलाकमान जब बहुत चाव से पान चबा रहे थे,तब हमारी निगाह पीकदान पर ही लगी हुई थी। चबाते-चबाते आखिर वह घड़ी भी आई। पीकदान उठाने के लिए हम झन्न से लपके। हम पीकदान अभी उठाए ही थे कि क्या देखते हैं…
यह कहकर दद्दा थोड़ी देर के लिए चुप हो गए। मैंने उनके मुँह को देखा। कुछ अलग ढंग से उनका मुँह बन रहा था।
फिर बोले…
हमने देखा कि दद्दनवा ने आलाकमान का पीक अपने चुल्लू में ले लिया और हम पीकदान पकड़े के पकड़े ही रह गए। इस बार स्याला हम फिर पिछड़ गए। मगर हमने भी हार नहीं मानी। मन ही मन ठान लिया कि अगर टिकट लेना है गुरु, तो हमें पीकदान के चक्कर में नहीं पड़ना है। फिर क्या…हमने कसके कमर कस ली। अगले दिन हम पान लेकर पहुँच गए। आलाकमान की शान में पान पेश किया। आलाकमान मजे लेकर पान खाने लगे। दद्दनवा हमें देख मुस्काता रहा। मगर हम अपना होंठ दबाए अपने लक्ष्य पर फोकस किये बैठे थे। हमें आलाकमान के थूकने का इंतजार था। थोड़ी देर बाद आलाकमान पीक को अपने काले धन की तरह ठिकाने लगाने के लिए अपना भरा मुँह इधर-उधर घुमाया। अभी हम दोनों हाथों को जोड़ ही रहे थे कि हम क्या देखते हैं…
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‘क्या दद्दा!’ मेरे मुँह से निकल ही गया।
‘ कि दद्दनवा अपना मुँह खोले बैठा है…
दद्दा अपनी आप बीती सुना कर तो चुप हो गए,पर मेरा मुँह खुला का खुला रह गया…

