स्वामी प्रसाद की पत्तेबाज़ी

आर्टिकल/इंटरव्यूस्वामी प्रसाद की पत्तेबाज़ी

Date:


स्वामी प्रसाद की पत्तेबाज़ी

अमित बिश्‍नोई

योगी सरकार के श्रम, रोजगार और समन्वय मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य पिछले दो दिनों से यूपी की चुनावी राजनीति की चर्चा केंद्र बने हुए हैं, अख़बार हों या टीवी या फिर सोशल मीडिया हर जगह स्वामी प्रसाद मौर्य की चर्चा। उनके योगी सरकार की कैबिनेट से इस्तीफे और भाजपा छोड़ने की ख़बरों से यूपी की सियासत में एक अल्पकालिक भूचाल सा आ गया है. भाजपा आलाकमान भी सकते में है, हंगामी बैठकों के दौर जारी हैं, डैमेज कण्ट्रोल के लिए टीमें लगा दी गयी हैं.

Read also: प्रियंका की महिला मैराथन से डरती क्यों है योगी सरकार?

यूपी की राजनीति से ताल्लुक रखने वाले सभी लोग जानते हैं कि कभी बसपा में बहुत कुछ होने वाले स्वामी प्रसाद मौर्या अच्छी तरह जानते हैं कि आपदा में अवसर कैसे तलाश किये जाते हैं, खुद की ब्रांड वैल्यू कैसे बनाई जाती है और उसकी भरपूर वसूली कैसे की जाती है. मायावती के साथ रहे तो खूब कीमत वसूली, बात बिगड़ी तो भाजपा के दौड़ते रथ पर सवार हो गए, खुद को कैबिनेट में स्थापित किया, बच्चों को संसद में शिफ्ट करवाया। अब जबकि हवा का रुख थोड़ा बदला तो निगाहें साइकिल की सवारी पर हैं.

कल तक मौर्या जी के इस्तीफे के बाद राजनीति के गलियारों में सत्ता में मची भगदड़ जैसा माहौल था, फिर शाम होते होते विरोधाभासी बयानों का दौर शुरू हो गया. एक खबर आती है कि इतने विधायक जा चुके हैं और इतने जाने वाले हैं. यूपी दिल्ली छोड़िये महाराष्ट्र से भी लोग भविष्यवाणी करने लगे. फिर खबर आती है कि सब मैनेज हो चूका है, कोई कहीं नहीं जा रहा है, बेटी कहती है कि पापा ने पार्टी छोड़ी है लेकिन दूसरी पार्टी पकड़ी नहीं है. पापा मौर्या जी एक टीवी चैनल से कहते हैं कि मंत्री पद से इस्तीफ़ा दिया है भाजपा से नहीं, साथ में यह भी कहते हैं कि भाजपा में जाने का सवाल नहीं। अजीब विरोधाभास है, चारों ओर एक कन्फ्यूज़न की हालत है. मौर्या जी कहते हैं कि 14 जनवरी को पत्ते खोलेंगे।

भारत की राजनीति में इस पत्ते खोलने वाली सियासत का भी अपना महत्त्व है. जब कुछ नहीं तो पत्तेबाज़ी शुरू हो जाती है, सामने वाला सोच में पड़ जाता है कि अगले के पास कौन से पत्ते हैं. अब मौर्या जी की पत्तेबाज़ी के क्या मतलब हैं यह तो वही जानें मगर मेरे हिसाब से इस पत्तेबाज़ी के सहारे वह सौदेबाज़ी का कोई मौका नहीं खोना चाहते है. अंदरखाने की बात है कि अभी भाजपा से सबकुछ ख़त्म नहीं हुआ है वरना “अभी सपा में शामिल नहीं हुआ” जैसा बयान सामने नहीं आता. वैसे मौर्या जी को यह गुमान है कि वह जहाँ सत्ता वहां।

Read also: सूडान में राजनीतिक परिवर्तन में सहायता के लिए अरब लीग ने संयुक्त राष्ट्र का किया स्वागत

मामला फिलहाल पर टिका है, यह शब्द भी बड़ा गहरा है, राजनीती में बहुत इस्तेमाल होता है. मौर्या जी और दूसरे कई भाजपा विधायकों द्वारा घर से भागने की ख़बरों के बीच इसी ‘फिलहाल’ शब्द ने भाजपा को काफी राहत भी दी क्योंकि कई भगोड़ों के बयानों में “फिलहाल अभी फैसला नहीं” का इस्तेमाल किया गया है. इस फिलहाल से यह बात तो पक्की हो चुकी है कि जितनी भगदड़ मीडिया में मची है हकीकत में इतनी भगदड़ है नहीं या फिर दिल्ली की सरगर्मी से इस भगदड़ को रोक दिया गया है.

दरअसल चुनावों के दौरान विधायकों, सांसदों और नेताओं का पाला बदलना बड़ी साधारण सी बात है, अगर मौर्या जी जैसे कुछ नेता भाजपा जैसी पार्टी को छोड़कर जाते हैं तो ऐसा नहीं है कि उसपर कोई पहाड़ टूट पड़ेगा या उसके पास नेताओं की कमी हो जाएगी। बात सिर्फ सन्देश की होती है और भगदड़ की ऐसी ख़बरों से जनता में सिर्फ सन्देश ग़लत जाता है वर्ना स्वामी प्रसाद मौर्या जैसे भाजपा में बहुत भरे पड़े हैं. आज उनके साइकिल पर सवार होने की ख़बरें आ रहीं हैं. सवार होंगे या नहीं, असलियत तभी पता चलेगी जब वह पत्ते खोलेंगे लेकिन उनका असली चेहरा ज़रूर जनता के सामने खुल चुका है

Share post:

Subscribe

Popular

More like this
Related