कश्मीरी पंडितों की मौतें, आंकड़ों की हेराफेरी क्यों?
अमित बिश्नोई
कश्मीरी पंडितों के पलायन पर बनी फिल्म “द कश्मीर फाइल्स” (The Kashmir Files) इन दिनों विवाद और चर्चा का विषय बनी हुई है, हर आदमी इस फिल्म पर अपनी राय दे रहा है, जिसने फिल्म को देखा है वह भी और जिसने नहीं देखा वह भी. राजनीतिक पार्टियां भी इस फिल्म को लेकर अखाड़ा खोदे हुए हैं. आरोप-प्रत्यारोपों का दौर जारी है. एक तरफ जहाँ लोग इस फिल्म की तारीफ कर रहे हैं और इस बात को मान रहे हैं कि पहली बार किसी ने कश्मीरी पंडितों की पीड़ा को सही ढंग से उजागर किया है और कश्मीरी पंडितों के घाटी से पलायन की सच्ची तस्वीर पेश की है वहीँ दूसरी ओर एक बहुत बड़ा तबका इस बात को मान रहा कि इस फिल्म में मुस्लिम समाज (Muslim community) को नकारात्मक भूमिका में दिखाया गया है जोकि सच नहीं है और इस फिल्म से पूरे देश में मुसलमानों के प्रति नफरत फैलाने की कोशिश हो रही है. इन सब बातों से अलग एक सच्चाई यह भी है कि एक आर्ट फिल्म बड़ी बड़ी कमर्शियल फिल्मों को मात देते हुए सैकड़ों करोड़ रूपये की कमाई कर फिल्म के प्रोड्यूसर की तिजोरी भर रही है.
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इस बीच सोशल मीडिया पर टाइम्स ऑफ़ इंडिया (Times of India) का एक ग्राफिक पिक्चर वायरल हुई है जिसका शीर्षक है Number of Kashmiri Pundits killed in militancy, जिसमें दिए गए आधिकारिक और अनाधिकारिक आंकड़ों में दिखाया गया है कि कितने कश्मीरी पंडितों की हत्या हुई. इस ग्राफ में बताया गया है कि फिल्म के डायरेक्टर विवेक अग्निहोत्री के मुताबिक 1989 के बाद से 4000 कश्मीरी पंडितों की हत्या हुई, वहीँ कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति के अनुसार 650, 1991 में आरएसएस के छपे एक पब्लिकेशन के मुताबिक 600 कश्मीरी पंडित मारे गए जबकि मिनिस्ट्री ऑफ़ होम अफेयर्स के आंकड़ों में सिर्फ 219 मौतें हुई.

अब सवाल उठता है कि मिलिटेंसी के दौरान मारे गए कश्मीरी पंडितों (Kashmiri Pandits) की संख्या में इतना अंतर क्यों? फिल्म के डायरेक्टर 4000 मौतों का आंकड़ा कहाँ से लेकर आये, विवेक अग्निहोत्री कहते हैं कि देश और विदेश में 700 पीड़ितों से बात की तो क्या उन लोगों ने उन्हें यह आंकड़ा दिया और अगर अग्निहोत्री को उनसे यह आंकड़ा मिला तो क्या उन्होंने सरकार से इसकी तस्दीक की, श्रीनगर जाकर प्रशासनिक दस्तावेज़ खंगालकर इस संख्या की पुष्टि की. सबसे बड़ा सवाल यह कि अगर अग्निहोत्री सही हैं तो फिर कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति के आंकड़े, आरएसएस (RSS) की किताब और मिनिस्ट्री ऑफ़ होम अफेयर्स के आंकड़े सब झूठे और मनगढंत हैं.
माना कि किसी भी सत्य घटना को फ़िल्मी रूप देने पर समझौते करने पड़ते हैं, पटकथा को ड्रामाई बनाने के लिए और फिल्म में रोमांच पैदा करने के लिए फिल्म के प्रोड्यूसर और डायरेक्टर, कभी कभी एक्टर भी कुछ बातें अलग से जोड़ते हैं लेकिन मौतों के आंकड़ों में इतना बड़ा अंतर तो नीयत पर सीधा सवाल खड़ा करता है. ग्राफ में अगर अग्निहोत्री को अलग कर बाकी सभी के आंकड़े जोड़ भी दें तो तब भी संख्या 1469 ही पहुँचती है लेकिन अग्निहोत्री साहब तो चार हज़ार पर पहुँच गए.
यहाँ पर एक RTI का ज़िक्र ज़रूरी है, पिछले बरस हरियाणा के एक RTI एक्टिविस्ट पी पी कपूर ने एक RTI डाली थी जिसमें अन्य सवालों के साथ यह भी पूछा गया था कि आतंकियों के हाथों कितने कश्मीरी पंडित मारे गए. इस याचिका के जवाब में जो 27 नवंबर, 2021 को श्रीनगर के डिस्ट्रिक्ट पुलिस हेडक्वार्टर्स के DSP की ओर से बताया गया कि कश्मीर में मिलिटेंसी भड़कने के बाद 1990 में सिर्फ 89 कश्मीरी पंडितों की हत्या हुई.
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हालाँकि बाद में इस RTI की पड़ताल करने पर पता चला कि यह संख्या 209 है. इंडियन एक्सप्रेस में 2008 में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक जम्मू-कश्मीर पुलिस (J&K Police) और राज्य सरकार ने 1989 में मिलिटेंसी आने के बाद 209 कश्मीरी पंडितों की हत्या हुई थी. यह संख्या मिनिस्ट्री ऑफ़ होम अफेयर्स के आंकड़ों से काफी मेल खाती है. गौरतलब यह भी है कि इस दौरान 16 सौ से ज़्यादा अन्य धर्मों के लोग आतंकियों के हाथों मारे गए जिनमें मुसलमानों की संख्या सबसे ज़्यादा थी और जिनमें कश्मीर के वह नामी नेता, डॉक्टर और बुद्धिजीवी भी शामिल थे जो मिलिटेंसी के हक़ में नहीं थे और उसके खिलाफ आवाज़ उठाई थी.
विवेक अग्निहोत्री की फिल्म में कितनी सच्चाई है या कितनी अधूरी, यह चर्चा का अलग विषय है, इस फिल्म को किसी ख़ास राजनीतिक पार्टी के लाभ के लिए बनाया गया है, इसपर लोगों के अलग अलग मत हो सकते हैं. इस फिल्म के बाद लोग देश की बहुत सी ऐसी घटनाओं पर भी फिल्म बनाने की बातें कर रहे हैं जिसमें मुसलमानों और दलितों पर अत्याचार हुआ है लेकिन जहाँ तक इस फिल्म की बात है और इस फिल्म को मिल रहे सत्ता के समर्थन का सवाल है निश्चित ही कुछ गंभीर प्रश्न दिमाग़ में कौंधते हैं और TOI के वायरल हुए इस ग्राफ में मौत की संख्या का इतना बड़ा अंतर यह ज़रूर दर्शाता है कि मामला कुछ तो गड़बड़ है.
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आखिर में एक कश्मीरी पंडित के कथन से लेख का समापन करता हूँ कि राजनीतिक पार्टियां हों या फ़िल्मकार सबने बदहाल कश्मीरी पंडितों का अपने मतलब के लिए इस्तेमाल किया है, किसी ने वापस बसाने की कोशिश नहीं की. हम आज भी रिफ्यूजी हैं और आगे भी रेफ्यूजी ही रहेंगे। इस पीड़ित की पीड़ा सच्ची है क्योंकि मेरा एक सवाल यह है कि कश्मीरी पंडितों का सच सामने लाने का और अपनी जान की बाज़ी लगाने का दावा करने वाले इस फिल्म के प्रोड्यूसर और डाइरेक्टर इनके नाम से कमाई जा रही अथाह दौलत में से इन मज़लूमों को कितना हिस्सा देंगे? अगर द कश्मीर फाइल्स (The Kashmir Files Movie) की टीम ऐसा कुछ नहीं करती तो फिर यही कहा जायेगा कि कोई और आया जिसने कश्मीरी पंडितों का इस्तेमाल किया।

