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दलित राजनीति को चाहिए एक नयी रैडिकल दिशा

आर्टिकल/इंटरव्यूदलित राजनीति को चाहिए एक नयी रैडिकल दिशा

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दलित राजनीति को चाहिए एक नयी रैडिकल दिशा

-एस. आर. दारापुरी आईपीएस(से.नि.)एवं राष्ट्रीय प्रवक्ता आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट

अब तक दलित राजनीति/दलित आंदोलन केवल सरकारी नौकरियों में आरक्षण बचाने तक ही सीमित रहा है और दलित नेता सत्ता हासिल करने को ही दलित राजनीति की जीत समझते रहे हैं। उनका लक्ष्य यहीं तक सीमित रहा है। यह सर्विदित है कि अगर आज की पूंजीवादी व्यवस्था में कोई दलित प्रधानमंत्री बन भी जाये तो भी दलितों का उद्धार नहीं हो सकता। ऐसी स्थिति में उद्धार सिर्फ उन दलित नेताओं का होगा जिनको सत्ता मिलेगी और उनकी गिनती कुछ हजार सांसद, विधायक या कुछ बोर्ड चेयरमैन तक सीमित रहेगी। जो दलित प्रवासी मजदूर और भूमिहीन किसान/मजदूर गरीबी का दंश अभी झेल रहे हैं वे तब भी झेलते रहेंगे। उनकी आर्थिक स्थिति में कोई सुधार नहीं होगा. हाँ उनके प्रति होने वाली हिंसा में कुछ कमी जरूर आ सकती है। अत: जब तक व्यवस्था परिवर्तन नहीं होगा ये समस्या बनी रहेगी। उत्तर प्रदेश में मायावती का चार बार का मुख्यमंत्री काल इसकी सबसे अच्छी मिसाल है.

संविधान सभा में डॉ आंबेडकर ने कहा था कि बिना राजकीय समाजवादी नीतियों के भविष्य की सरकारें राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक न्याय कैसे सुनिश्चित करेंगी। उनकी आशंका आज सही साबित हो रही है। उन्होंने कहा था कि दलितों के दो दुश्मन हैं: पूंजीवाद और ब्राह्मणवाद. मगर आज के दलित नेताओं ने तो पूंजीवाद से दोस्ती कर ली है। ऐसे दलित नेताओं से सत्ता पर आसीन पूंजीपतियों और ब्राह्मणवादियों को कोई खतरा नहीं है क्योंकि देश की पूंजी पर उनका कब्जा बना रहेगा और वे पैसे के दम पर देश की नीतियों को निर्धारित करते रहेंगे।

अमरीका का उदाहरण हमारे सामने है जहाँ काले लोगों ने गोरों के हाथों बड़े अत्याचार सहे और इसके खिलाफ संघर्ष किये और जीत की तरफ बढ़े और अंत में उनके सिविल राइटस मूवमेंट के बाद 1964 में बराबरी का अधिकार पाया। मगर इसके बावजूद आज भी उनकी हालत में ज्यादा बदलाव नहीं आया है और अमरीका में आज भी ज्यादातर काले लोग गरीबी में जीवन व्यतीत कर रहे हैं। इतना ही नहीं 2009 से 2017 तक काले बराक ओबामा के राष्ट्रपति बनने पर भी उनकी गरीबी दूर नहीं हुई और अभी कोरोना महामारी की सबसे अधिक मार उन्हीं पर पड़ रही है जिसके खिलाफ ओबामा ने आवाज़ भी उठाई थी।

डॉ अम्बेडकर ने 1947 में आल इंडिया शैडूल्ड कास्ट्स फेडरेशन की ओर से भावी संविधान में बहुजन समाज के अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिये संविधान सभा में स्टेट्स एंड माईनौरटीज शीर्षक से संविधान के ड्राफ्ट के रूप में अपना मेमोरेंडम भेजा था जिसकी धारा 4 में उन्होंने सुझाव दिया था कि देश के मुख्य और आधारभूत उद्योग सरकार के पास होने चाहिये और देश की खेती की जमीन का राष्ट्रीयकरण करके उस पर सामूहिक खेती की व्यवस्था होनी चाहिए. अगर ऐसा होता तो हजारों वर्षों से खेती की जमीन पर मालिकाना हक से वंचित भूमिहीन दलित किसानों को भी खेती की जमीन में बराबरी का हक़ मिलता और दलितों को राष्ट्रीय उद्योगों में बराबरी के अवसर मिलते। मगर ऐसा नहीं हुआ और दलितों का शोषण बदस्तूर जारी है. यह सर्विदित है कि जिनका जमीन और पूंजी पर पहले से कब्जा है वही इस पूंजीवादी व्यवस्था का लाभ उठाते आये हैं और उठाते रहेंगे।

अब तो सरकारी उद्योगों का निजीकरण हो जाने से दलितों के आरक्षण के अवसर भी निरंतर सिकुड़ रहे हैं. केरल और बंगाल को छोड़ कर किसी भी राज्य में भूमि सुधार लागू नहीं किए गए हैं जिसके फलस्वरूप आज भी खेती से जुड़े होने के बावजूद 70% दलित भूमिहीन हैं. गाँव में उनकी भूमिहीनता एवं केवल हाथ का श्रम दलितों की सबसे बड़ी कमजोरी है. अतः भूमि सुधार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने कि पहले थे.

यह भी सही है कि पिछले कुछ सालों में दलितों ने अस्मिता की राजनीति को अपना कर कुछ राजनीतिक सत्ता प्राप्त भी की थी परन्तु वह केवल सत्ता की राजनीति हो कर रह गयी और दलितों की किसी भी समस्या का हल नहीं निकला. उलटे इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि इससे हिंदुत्व की विचारधारा ही मजबूत हुयी और दलितों का बड़ा हिस्सा हिंदुत्व की चपेट में आ गया. आज स्थिति यह है कि लोकतंत्र में यदि दलित कुछ संवैधानिक अधिकार प्राप्त करने की उम्मीद भी कर सकते थे परन्तु अब भाजपा के अधिनायिक्वादी शासन में उनका निरंतर ह्रास हो रहा है. डा. आंबेडकर के राजकीय समाजवाद की जगह अब करोनी पूँजीवाद एवं वित्तीय पूँजी का दबदबा स्थापित हो गया है जिससे न केवल दलित बल्कि देश की बहुत बड़ी आबादी गरीबी, बेरोज़गारी, भुखमरी एवं शोषण का शिकार होने जा रही है.

अतः इस बात की सख्त ज़रुरत है कि वर्तमान दलित राजनीति अस्मिता की राजनीति से मुक्त हो कर एक रैडिकल एजेण्डा लेकर जनवादी एवं समाजवादी राजनीति को अपनाना होगा और इस दिशा में प्रयासरत राजनीतिक दलों से हाथ मिलाना होगा. हमारी पार्टी आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट (आईपीऍफ़) इस दिशा में काफी समय से कार्यरत है और वह दलितों/आदिवासियों का भूमि प्रश्न, मजदूरों के अधिकारों एवं किसानों की खेती को लाभकारी बनाने की लड़ाई सफलता पूर्वक लड़ रही है. अतः आपसे अनुरोध है कि आप अधिक से अधिक संख्या में हमारी पार्टी से जुड़ें.

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