पैग़म्बर मोहम्मद साहब पर भाजपा नेताओं द्वारा की गयी टिप्पणी का मामला अब अंतर्राष्ट्रीय रूप लेता जा रहा है। मुस्लिम देशों और मुस्लिम संगठनों ने बाकायदा एक मोर्चा खोल दिया है. कहा जा रहा है इस मामले में देश माफ़ी मांगे। मगर सवाल पैदा होता है कि क्यों? कुछ सिरफिरे लोगों ने किसी धर्म के सबसे पूजनीय के बारे में कुछ बेहूदा टिप्पणी अगर कर दी तो उसके लिए देश या देश के सारे लोग कैसे ज़िम्मेदार हो गए. इस मामले में तेलंगाना के मुख्यमंत्री KCR के मंत्री पुत्र KTR ने कहा कि अपने नेताओं के नफरती भाषणों पर भाजपा को माफ़ी मांगनी चाहिए लेकिन एक राष्ट्र के रूप में भारत क्यों माफ़ी मांगे?
बेशक भाजपा नेताओं ने पैगम्बर मोहम्मद पर जो टिप्पणी की वह किसी भी तरह स्वीकार योग्य नहीं है और न ही की जा सकती है लेकिन इस मुद्दे पर खाड़ी देशों ने भी जो स्टैंड लिया है वह अनुचित और गैरज़रूरी है. अभी सोशल मीडिया पर न जाने क्या क्या चल रहा है कि खाड़ी के देशों में भारतीय प्रोडक्ट के बॉयकॉट का एलान हो गया है, वहां काम कर रहे भारतियों (हिन्दू समुदाय) पर नौकरी छोड़ने का दबाव डाला जा रहा है. हालाँकि इन बातों में कितनी सच्चाई है कहा नहीं जा सकता लेकिन अगर ऐसा कुछ भी है तो यह बहुत गलत और जिहालत भरी बात होगी।
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सोशल मेडिया पर यह भी चल रहा है कि मुस्लिम देशों की इस नाराज़गी की वजह से ही सरकार के दबाव में भाजपा ने अपने दो नेताओं नूपुर शर्मा और नवीन कुमार जिंदल पर कार्रवाई की और मीडिया को पत्र जारी कर अपना स्टैंड साफ़ किया कि भाजपा ऐसे किसी भी विचार या विचारों को स्वीकार नहीं करती जिनसे किसी भी धर्म-सम्प्रदाय के लोगों की भावना को ठेस पंहुचे। भाजपा ने तो इन दोनों नेताओं को infringe element (उल्लंघन करने वाले तत्व) तक कह दिया। किसी कार्यकर्त्ता या नेता के खिलाफ एक्शन लेते समय भाजपा ने शायद ही कभी इस तरह की शब्दावली का इस्तेमाल किया हो। सवाल यह है कि भारत सरकार क्या इतनी कमज़ोर है कि कुछ देशों की टिप्पणियों पर देश की राजनीतिक पार्टी पर अपने नेताओं के खिलाफ कार्रवाई के लिए दबाव डाले। भारत सरकार खुद इतनी सक्षम और मज़बूत है कि किसी एक्शन के लिए उसे दूसरे देशों की सलाह की ज़रुरत नहीं है।
टीआरएस के अलावा कांग्रेस पार्टी भी इसी स्टैंड को मानती है कि भाजपा नेताओं की ग़लती के लिए भारत क्यों माफ़ी मांगे। किसी भी व्यक्ति, संगठन या पार्टी से देश बहुत बड़ा होता है। भारत जैसे विविधता वाले देश में जहाँ हर पचास किलोमीटर पर बोली भाषा, रहन सहन, खान पान और संस्कृति बदल जाती है वहां पर कुछ लोगों के नफरती विचारों के लिए मोहब्बत और भाईचारे की विधारधारा को मानने वाले माफ़ी क्यों मांगे। भारत ने आज खाड़ी देशों की इन टिप्पणियों को सख्ती से ख़ारिज करके बहुत सही काम किया है। भारत ने यह स्पष्ट कर दिया कि पैग़म्बर मोहम्मद विवाद पर मुस्लिम देशों की दखलंदाज़ी अनुचित है।
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हमारे देश की सरकार और हमारे देश के लोग इस बारे में पूरी तरह से सजग हैं कि क्या सही और क्या गलत है। देश की अधिकाँश आबादी भाजपा नेताओं की टिप्पणियां को सही नहीं मानती लेकिन वह घरेलू मामले में बाहरी दखल अंदाज़ी भी सही नहीं मानती और इसमें भारत का मुसलमान भी शामिल है। भारत में मुसलमानों की जितनी आबादी है उतनी इन खाड़ी देशों की पूरी आबादी भी नहीं है। भारत का मुसलमान पहले भारतवासी है फिर वह मुसलमान है। यह सच है कि देश में साम्प्रदायिक तौर पर नफरत की घटनाओं में इज़ाफ़ा हुआ है लेकिन इसका हल भी भारत के लोग ही निकालेंगे न कि कोई बाहरी। आरएसएस प्रमुख मोहन भगवत का बयान हो या फिर जमीयत के रहनुमां मौलाना महमूद मदनी की अपील, सभी लोग इस कोशिश में लगे हैं कि देश में अम्न और शांति बरकरार रहे क्योंकी अशांति से तो हर धर्म सम्प्रदाय के लोग प्रभावित होते हैं, कोई कम तो कोई ज़्यादा लेकिन अशांति का खामियाज़ा भुगतना तो सभी को पड़ता है. इसलिए मेरी विनती है कि आप अपने देश की समस्याओं को देखो हम अपने देश की समस्यों को देखने में सक्षम हैं और आपसे अच्छी तरह।

