कोरोना वैक्सीनेशनः सरकार की नीयत पर कोर्ट के सवाल

आर्टिकल/इंटरव्यूकोरोना वैक्सीनेशनः सरकार की नीयत पर कोर्ट के सवाल

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कोरोना वैक्सीनेशनः सरकार की नीयत पर कोर्ट के सवाल

सुनील शर्मा

कोरेाना संक्रमण से देश को निजात दिलाने के लिये केंद्र सरकार ने कोरोना वैक्सीनेशन को बेहद आवश्यक बताया था। खुद पीएम नरेेन्द्र मोदी अनेक मंचों पर देशवासियों से कोरोना का टीका लगवाने की अपील कर चुके हैं। केंद्र सरकार की ओर से राज्य सरकार के सहयोग से कोरोना टीकाकरण अभियान चलाया जा रहा है। मगर केंद्र सरकार का यह महाअभियान शुरूआत से ही सवालों के घेरे में है। सरकार के लिये परेशानी की बात यह है कि कोरोना टीकाकरण अभियान को लेकर अब विपक्षी दलों से ज्यादा सवाल अदालतें उठा रही हैं। अनेक मौकों पर केंद्र सरकार को कोर्ट से फटकार भी लग चुकी है। मगर अब सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट ने सरकार की नीतियों पर सवाल खड़े कर दिये हैं।

सुप्रीम कोर्ट का यह कहना कि ‘केंद्र सरकार की 18 से 44 वर्ष के लोगों के लिए वैक्सीनेशन की पाॅलिसी मनमानीपूर्ण और अतार्किक है’ केंद्र सरकार की नीतियों पर सवाल खड़े करता है। वहीं शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को कोविड-19 टीकाकरण नीति पर अपनी सोच दर्शाने वाले प्रासंगिक दस्तावेज, फाइल नोटिंग रिकाॅर्ड पर रखने के निर्देश भी दिये हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्रीय बजट में वैक्सीन की खरीद के लिए रखे गए 35,000 करोड़ रुपये का हिसाब मांगना किसी भी सरकार के लिये बेहद शर्मनाक स्थिति है।

वहीं देश भर से कोरोना वैक्सीन की कमी के कारण टीकाकरण केंद्रोें को बंद किये जाने की खबरें आ रही हैं। ऐसे मेें दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछ लिया कि जब आपके पास वैक्सीन ही नहीं है तो फिर घोषणा क्यों की। कोविड-19 की दूसरी लहर में युवा पीढ़ी ज्यादा प्रभावित हो रही है और उसे वैक्सीन उपलब्ध नहीं हो पा रही है। युवा कोरोना संक्रमण से गंभीर रूप से बीमार होने के साथ जान तक गंवा रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट के द्वारा केंद्र सरकार से पूछे गये सवाल आज हर उस युवा के मन में हैं जो वैक्सीन लगवाने से वंचित रह गये हैं। केंद्र सरकार की नीयत सही हो सकती है मगर उसकी नीतियां शुरू से संदेह के घेरे में रही हैं। पहले सरकार द्वारा कोरोना वैक्सीन को देश के नागरिकों को लगाये जाने की बजाये अन्य देशों में निर्यात करने को लेकर सवाल उठे तो उसके बाद 45 प्लस के आयु वर्ग से कोरोना वैक्सीन अभियान को शुरू करना अचरज भरा निर्णय रहा। इसके बाद देश में वैक्सीन की उपलब्धता का आंकलन किये बिना सरकार ने 18-44 आयु वर्ग के लिये वैक्सीन अभियान शुरू कर दिया। नतीजा तो गलत निकलना ही था इसलिये जोर-शोर से शुरू किये गये अभियान के बावजूद यह अभियान सफल नहीं माना जा सकता। क्योंकि वैक्सीन की कमी के कारण युवा वर्ग कोरोना का टीका नहीं लगवा पा रहा है।

कोरोना टीकाकरण अभियान को सफल बनाकर श्रेय लुटने के प्रयास में केेंद्र सरकार को यह अंदाजा भी नहीं हुआ कि पहली डोज लगवा चुके लोगों को वैक्सीन की दूसरी डोज भी लगानी हैै। अब वैक्सीन कम रह गयीं तो यह तय करना मुश्किल हो गया कि 45 प्लस वालों को दूसरी डोज लगायें या युवाओं को पहली डोज। ऐसे में कोविशील्ड की दूसरी डोज लगाने का समय आगे बढ़ाकर सरकार ने कुछ समय और हासिल कर लिया। मगर समस्याएं यहीं खत्म नहीं हुई और सरकार की आशाओं के विपरित युवा कोरोना वैक्सीन लगवाने के लिये उमड़ पड़े। इसके लिये न सरकार तैयार थी और न ही पर्याप्त वैक्सीन उपलब्ध थी। ऐसे में नये वैक्सीनेशन सेंटर खुलते गये और वैक्सीन की कमी के कारण पुराने सेंटरों को बंद किया जाता रहा। टीकाकरण को प्रेरित करने वाले वैक्सीन सेंटरों पर टीका उपलब्ध नहीं है की सूचना दी जाने लगी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ‘जब कार्यकारी नीतियों के जरिये नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का हनन होता है तो हमारा संविधान, अदालत तो मूक दर्शक बनने रहने की इजाजत नहीं देता।’ निःसंदेह जब हमारी आस सरकारी सिस्टम से टूट जाती है तब भी अदालत पर भरोसा होता है कि वह हमें न्याय दिलायेंगी। इस संवेदनशील और लोगों की जिंदगी से जुड़े मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट द्वारा निगरानी करना और कमियों पर केंद्र सरकार से लेकर राज्य सरकार तक को टोकना लोकतंत्र के प्रति आस्था और विश्वास कायम करता है।

किंतु नीतियां बनाना और उनका क्रियान्वयन उचित तरीके से करवाना सरकार का काम है। नीयत चाहे जितनी भी अच्छी क्यों न हो यदि परिणाम अनुकुुल न निकले तो समझ लेना चाहिये कि कहीं न कहीं आपकी नीतियों में कमी है। ऐसे में केंद्र सरकार को वक्त रहते उचित कदम उठाकर देश के नागरिकों को कोरोना वैक्सीन उपलब्ध कराने की दिशा में सार्थक प्रयास करने होंगे। यदि सरकार ऐसा न कर पायी तो वह अदालतों को आंकड़े देकर संभवत संतुष्ट कर भी ले मगर जनता की अदालत में सरकार को दोषी करार दिये जाने में समय नहीं लगेेगा। और जनता की अदालत में माफी नहीं मिलती बस सजा सुनाई जाती है

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