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दादा को सम्मान देकर पोते को साधना

आर्टिकल/इंटरव्यूदादा को सम्मान देकर पोते को साधना

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अमित बिश्नोई
टाइमिंग का महत्त्व वैसे तो हर क्षेत्र में बहुत अहम् होता है लेकिन राजनीति में इसका महत्त्व कहीं ज़्यादा होता है और नरेंद्र मोदी इस कला में माहिर हैं, मतलब टाइमिंग के मास्टर हैं. कब किसे कुछ देना है, कब किससे कुछ लेना है और इस लेनदेन का चुनावी फायदा क्या मिलेगा, ये मोदी जी को बहुत अच्छी तरह आता है. मोदी जी वैसे भी हर बात को चुनावी नज़र से ही देखते हैं. मोदी जी के फैंस कहते हैं कि वो देश के लिए 18 घंटे काम करते हैं, अब ये बात अलग है कि उन 18 घंटों में राजनीतिक घंटे कितने होते हैं. बहरहाल बात टाइमिंग की हो रही थी तो आज प्रधानमंत्री मोदी ने अपने एक्स हैंडल से तीन लोगों को मरणोंपरांत भारत रत्न देने का एलान किया। आपको भी मालूम होगा कि देश का सबसे ऊंचा अवार्ड है, अब इस ऊंचे के बहुत से मायने आप निकाल सकते हैं. तो आज भारत रत्न के लिए जिन तीन नामों की घोषणा हुई उनमें दो नाम राजनीतिक और एक नाम गैर राजनीतिक था. तो चलिए जिस गैरराजनीतिक व्यक्ति को ये सम्मान देने की घोषणा की गयी उसका नाम बताकर ये बात यहीं ख़त्म करें क्योंकि ये लेख उन दो राजनीतिक लोगों पर है जिन्हें मोदी जी ने भारत रत्न के लिए चुना। ये गैरराजनीतिक हस्ती हैं वैज्ञानिक डॉक्टर एमएस स्वामीनाथन, जिन्हें हरित क्रांति का जनक कहा जाता है.

खैर अब आते हैं उन दो नामों पर जिनका ताल्लुक गहराई से राजनीतिक है विशेषकर तब जब लोकसभा चुनाव सिर पर हैं. इन दो नामों में एक नाम उत्तर प्रदेश की राजनीती से है और दूसरा दक्षिण की राजनीती से. ये तो सभी को मालूम है कि मोदी जी इस बार खुद 400 की बात कर रहे हैं, हालाँकि सीटों की संख्या बताने का डिपार्टमेंट पहले अमित शाह के पास था. हर चुनाव से पहले वो ही इस बात की घोषणा करते थे कि भाजपा इसबार कितनी सीटें जीतने जा रही है। अब वो डिपार्टमेंट भी मोदी जी ने अपने हाथों में ले लिया है और सीना ठोंककर कह रहे कि एक अकेला सब पर भारी। पहले विपक्ष आरोप लगाता था कि ढाई लोग सरकार चलाते हैं, अब उसमें भी डेढ़ गायब हो गए हैं और गारंटी अब भाजपा की नहीं मोदी की दी जाती है।

खैर बात भारत रत्न की चल रही थी. इंडिया गठबंधन के बनने के बाद मोदी जी का एकमात्र लक्ष्य उसे तोड़ना और कमज़ोर करना था. राम मंदिर का इशू निपटने के बाद भाजपा इसी काम पर लग गयी. भाजपा का मतलब मोदी और मोदी का मतलब भाजपा। बिहार में उन्हें बड़ी जल्दी कामयाबी मिल गयी। इंडिया गठबंधन के संस्थापकों में से एक नितीश बाबू वापस भाजपा के संग चले गए, चट मांगनी पट ब्याह की तरह. सुबह इस्तीफ़ा और शाम को शपथ. नितीश बाबू भी पलटी मार मार कर थक चुके है और इसलिए अब वो बार बार कह रहे हैं कि अब जीना यहाँ और मरना भी यहाँ। मोदी जी ने बिहार फतह कर इंडिया गठबंधन की नींव को हिला दी। हौसले बढ़े और अगला टारगेट यूपी से ढूँढा जाने लगा. यहाँ सपा और कांग्रेस तो उनके साथ जा नहीं सकते थे इसलिए निशाना पश्चिमी उत्तर प्रदेश पर साधा और जयंत से करीबी बढ़ने लगी, मीटिंग और सेटिंग होने लगी. मीडिया को भी पेशबंदी के लिए लगा दिया गया जो बड़े ज़ोर शोर से ख़बरें चलाने लगा कि जयंत चौधरी ने अखिलेश को छोड़ दिया है और भाजपा के साथ लोकसभा चुनाव लड़ने का फैसला कर लिया है। बाकायदा सीटें भी बता दी गयीं कि रालोद को भाजपा कौन कौन सी सीटें दे रही है। इधर अखिलेश बार बार दोहराते रहे कि जयंत उन्हें छोड़कर नहीं जा सकते।

मीटिंग और सेटिंग तो हो ही चुकी थी, बस इंतज़ार था तो टाइमिंग का और सही मुहूर्त देखते ही मोदी जी ने अपने एक्स हैंडल का इस्तेमाल किया और घोषणा कर दी कि पूर्व प्रधानमंत्री और रालोद प्रमुख जयंत चौधरी के दादा चौधरी चरण सिंह और कांग्रेस सरकार के पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव को भारत रत्न दिया जाता है. अब क्या बचा, इस एलान के बाद जयंत चौधरी के पास भाजपा के साथ जाने के सिवा कोई विकल्प ही नहीं बचा. उन्हें कहना पड़ा कि अब किस मुंह से वो भाजपा को इंकार करें। एहसान जो इतना बड़ा मोदी जी ने कर दिया। किसी और सरकार ने चौधरी साहब के बारे में नहीं सोचा, सिर्फ मोदी जी सोचा। वो देश के लोगों की नब्ज़ समझते हैं। जयंत ने सही बात कही कि मोदी जी देश की नब्ज़ को समझते हैं, उन्हें मालूम है नब्ज़ को कब दबाना और कब छोड़ना है। फिलहाल दादा को सम्मान देकर पोते की नब्ज़ को दबा दिया गया है। एहसानों के बोझ तले पोता अब करे तो क्या करे? सॉरी अखिलेश! जब ये बोझ हल्का होगा तब तुमसे फिर गठबंधन करेंगे, अभी तो हमें टाइमिंग के मास्टर मोदी जी की तारीफ करने दो।

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