अमित बिश्नोई
137 साल पुरानी कांग्रेस पार्टी अब तकनीकी तौर पर 80 पार मल्लिकार्जुन खड़गे के नेतृत्व में चलेगी। खड़गे कांग्रेस के उन चंद नेताओं में शामिल हो गए हैं जिन्हें तकनीकी रूप से गाँधी परिवार से बाहर का बताया जा रहा है. खैर बाहरी तो वो हैं ही, कहाँ पंडित नेहरू का परिवार और कहाँ कर्नाटक का एक दलित। बाहरी तो वो कहलाये ही जायँगे लेकिन क्या सचमुच में वो बाहरी है यह सवाल पहले भी चल रहा रहा था और आगे भी चलेगा। खड़गे परम्परावादी माने जाते हैं जो खींची हुई लकीर पर चलना पसंद करते हैं, अध्यक्ष पद के मुकाबले में उन्होंने उस शख्स को हराया जो नई लकीर पर चलना चाहता है, अपनी लकीर खुद खींचना चाहता है, जो दिखने में मॉडर्न है और सोच में भी. जो पुरानी परम्पराओं का सम्मान करते हुए परिवर्तन के साथ पार्टी को आगे बढ़ाने की बात करता है लेकिन कांग्रेस और कांग्रेसी दोनों ही परंपरावादी निकले और उन्होंने परंपरा को न छोड़ने का फैसला किया और परिवर्तन को ठुकरा दिया।
कांग्रेस में गाँधी फैमिली को ही परंपरा माना जाता है, गाँधी परिवार के बिना कांग्रेसी अपने वजूद की कल्पना ही नहीं कर सकते। अब इसका सबसे ताज़ा उदाहरण इस चुनाव के मतदान को ही ले लीजिये। मतदान में करोड़ों कांग्रेसियों में सिर्फ 9000 लोग ही ऐसे थे जिन्हें अध्यक्ष पद के चुनाव में वोट डालने का अधिकार था। इन्हें डेलीगेट्स बोला गया. ज़ाहिर सी बात है कि लाखों करोड़ों कांग्रेसियों में सिर्फ नौ हज़ार लोगों को वोटिंग पावर मिलना मतलब इन लोगों में कुछ तो बात होगी है, यह अन्य कांग्रेसियों से ज़्यादा विवेक रखते होंगे, ज़्यादा ज्ञान रखते होंगे, ज़्यादा समझ रखते होंगे। मगर इनमें से भी 416 लोग इस सारी योग्यताओं से अलग एक योग्यता और भी रखते थे और वो थी भक्ताई की योग्यता, क्योंकि इनमें से बहुत से लोगों ने न तो खड़गे को वोट दिया और न ही थरूर को. इन सब ने मतपत्र पर राहुल गाँधी का नाम लिखकर अपनी सुपर भक्ति का सबूत दिया। कांग्रेस पार्टी को ऐसे लोगों की जानकारी सार्वजानिक कर इन्हें सुपर फैन के अवार्ड से नवाजना चाहिए। हम भले ही इस बात लेकर कटाक्ष कर रहे हैं लेकिन ऐसे लोगों की मानसिकता पर शर्म भी आती है और अफ़सोस भी. कितने गैरज़िम्मेदार हैं यह लोग जो अपनी ही पार्टी अध्यक्ष के चुनाव को एक मज़ाक समझते हैं. कांग्रेस पार्टी को तो ऐसे लोगों पर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए।
अब बात नए परम्परावादी अध्यक्ष की. आप इनके राजनीतिक कैरियर की बात करेंगे और उसे जानने की कोशिश करेंगे तो कर्नाटक की राजनीति से उभरकर राष्ट्रीय राजनीति में अपना मुकाम बनाने वाले मल्लिकार्जुन खरगे आपको बहुत सुलझे हुए और संघर्षशील नेता नज़र आएंगे। दक्षिण के यह ऐसे छठे नेता हैं जो देश की सबसे पुरानी पार्टी के सर्वोच्च पद पर पहुंचे हैं और छठे ऐसे नेता भी बने हैं जो चुनाव जीतकर अध्यक्ष बने हैं और गैर गाँधी परिवार से हैं. बड़ा चमकदार कैरियर रहा है इनका अबतक, बंद कमरों में नेताओं से संवाद करना, समस्याओं को हल करना इन्हें बहुत आता है मगर यह अच्छे वक्ता बिलकुल भी नहीं हैं, जो एक पार्टी अध्यक्ष की विशेष योग्यता होती है. जनता से संवाद करने की योग्यता। दक्षिण के राज्यों में खरगे कितना असरदार साबित होंगे इसपर विश्वास के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता लेकिन हिन्दीभाषी राज्यों में यह बिलकुल बेअसर रहेंगे इस बात को पूरे विशवास के साथ कहा जा सकता है.
अब बात इनके गाँधी परिवार से होने और न होने की तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वो परिवार से हैं या परिवार के बाहर से. मैटर यह करता है कि कांग्रेस पार्टी में अब खड़गे की झलक दिखाई देगी या फिर वही घिसा पिटा गाँधी परिवार का परम्परावाद । खड़गे में क्या के. कामराज बनने की अब चाहत नज़र आएगी या फिर रिमोट कंट्रोल की जो बाते चल रही हैं वहीँ असलियत है. हालाँकि खड़गे को रिमोट कंट्रोल की बात से कोई ऐतराज़ भी नहीं है यह बात उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान कही भी थी. बहरहाल खरगे की जीत से बहुसंख्यक कांग्रेसी खुश हैं कि परिवर्तन होने से बच गया, क्योंकि ज़्यादातर कांग्रेसियों को परिवर्तन से बड़ा डर लगता है. कहते हैं डर के आगे जीत होती है, थरूर भी कुछ इसी लाइन पर चल रहे थे लेकिन कांग्रेसियों को डरपोक कहलाना पसंद है हार भी स्वीकार है मगर परिवर्तन नहीं। खैर कांग्रेस पार्टी में 22 साल बाद चुनाव हुआ यह एक अच्छी बात है. भले ही इस चुनाव में परिवर्तन पर परम्परा भारी पड़ी लेकिन थरूर ने चुनाव में 11-12 प्रतिशत वोट हासिल कर यह तो जाता ही दिया कि पार्टी में इतने लोगों की परिवर्तन में रूचि है, एक आग तो जला ही दी है, आने वाले सालों में पार्टी में परिवर्तनकारियों की संख्या बढ़ भी सकती है. हर चीज़ का एक दिन अंत होता है, परम्पराएं भी समाप्त होती हैं, कांग्रेस में भी एकदिन समाप्त होंगी। कोई न कोई थरूर तो इसमें एकदिन कामयाब होगा।

