नई दिल्ली। आखिरकार कांग्रेस प्रशांत किशोर यानी पीके की समस्या से आजाद हो ही गई। यह होना भी था। कांग्रेस को पीके समस्या से आजादी मिलने पर सबसे अधिक खुशी कांग्रेस के सेवेंटी प्लस के योद्धाओं में है। पीके कांग्रेस में आते तो सबसे अधिक नुकसान इन सेवेंटी प्लस के कांग्रेसियों को ही होना था। पीके और कांग्रेस के बीच ऐसी क्या बात हुई। जिसके चलते पीके चेप्टर का अंत हुआ। यह तो सिर्फ पीके यानी प्रशांत किशोर बता सकते हैं या फिर कांग्रेस के शीर्ष को ही पता है। असली कारणों से अलग होकर दोनों ही मीडिया में दूसरी बातों को इसका कारण बता रहे हैं।
कांग्रेस का कहना है कि उसने अब तय किया है कि उसे अपना घर दुरूस्त करने के लिए किसी पीके या फिर बाहरी विशेषज्ञ की आवश्यक्ता नहीं है। कांग्रेस के पास अनुभवी नेताओं की लंबी फौज है। हालांकि इसकी आशंका पहले से थी कि 137 साल पुरानी और बूढी हो चुकी कांग्रेस को कोई पीके भी नहीं ठीक कर सकते। 137 साल बूढ़ी इस कांग्रेस को आखिरकार 45 साल के पीके का साथ कैसे रास आता। दरअसल पीके के कांग्रेस में आने पर प्रियंका और राहुल कोई बड़ा रोड़ा नहीं थे।
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सबसे अधिक उन लोगों को आपत्ति थी जो कि जो कांग्रेस में काम करते हुए 70 साल की उम्र पार कर चुके और ये बुजुर्ग चाहते हैं कि कांग्रेस अभी इसी हाल में ही रहे। हालांकि इन बुजुर्ग कांग्रेसियों के बच्चे भी पीके की उम्र के हो चुके या फिर उससे अधिक के हैं। कांग्रेस और पीके के बीच समझौते की असफलता पर यह भी उम्मीद जताई जा रही है कि सोनिया गांधी अपनी सास इंदिरा गांधी की तरह असंतुष्ट नेताओं को नियंत्रित नहीं कर पा रही हैं। या फिर आंतरिक प्रजातंत्र ज़रूरत से अधिक ही कांग्रेस में हैं।

