Political News: तो क्या ‘आप’ के भीतर चल रहे इस खेल का खामियाजा कर्नल कोठियाल को भुगतना पड़ा फिर छोड़ी पार्टी

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देहरादून। 2022 विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी का चेहरा रहे कर्नल कोठियाल के पार्टी को छोड़ने के बाद कई सवाल खड़े होने लगे हैं। यहां तक कि पार्टी के भीतर ही कई तरह की चर्चाएं तेज हो गई हैं। जिसमें आम आदमी पार्टी के प्रदेश प्रभारी और सह प्रभारी की रणनीति पर उन्हीं के कार्यकर्ता सवालिया निशान खड़ा करते नजर आ रहे हैं। दरअसल उत्तराखंड में 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले आम आदमी पार्टी ने कर्नल कोठियाल को मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाकर एक बड़ा दांव खेला था। जानकार यह मान रहे थे कि आम आदमी पार्टी उत्तराखंड में अपना खाता खोलने के साथ-साथ सत्ता की चाबी भी उसके हाथ में होगी।

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लेकिन पार्टी के भीतर चल रही गुटबाजी और खींचतान का नतीजा यह हुआ कि प्रदेश अध्यक्ष कलेर खटीमा से जबकि कर्नल कोठियाल गंगोत्री से अपना चुनाव हार गए। यही नहीं 70 विधानसभाओं में पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा। जिसके बाद से लगातार पार्टी के भीतर घमासान मचा हुआ है। आम आदमी पार्टी हिमाचल के चुनाव की रणनीति तैयार करने में लगी हुई हुई थी कि कर्नल कोठियाल ने भी पार्टी को छोड़ एक बड़ा झटका दिया है। जिसके बाद पार्टी के भीतर उठ रहे विरोधी सुर भी तेज हो चले हैं। कई नेताओं का आरोप है कि प्रदेश प्रभारी दिनेश मोहनिया और सह प्रभारी राजीव चौधरी की गलत नीतियों के चलते पार्टी को इस हादसे पर पहुंचा दिया है।

 पार्टी के भीतर उठ रहे हैं विरोध के स्वरों के बीच राजनीतिक जानकार भी मानते हैं कि प्रभारी और सह प्रभारी की गलत रणनीति के चलते आम आदमी पार्टी को इस चुनाव में बुरी हार का सामना करना पड़ा है। जानकार बताते हैं कि प्रभारी और सह प्रभारी ने स्थानीय नेतृत्व और केंद्रीय नेतृत्व के बीच एक गहरी खाई बनाने का काम किया था। जिसके चलते पार्टी को ना केवल हार का मुंह देखना पड़ा। बल्कि उत्तराखंड के बड़े नाम भी पार्टी से किनारा करते नजर आए। दिनेश मोहनिया को 2020 में आम आदमी पार्टी ने उत्तराखंड के प्रभारी के तौर पर नियुक्त किया था।

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जिसके बाद से उत्तराखंड के कई बड़े नाम जो पार्टी से जुड़े थे वह किनारा करते चले गए। पार्टी के साथ जुड़े जाने-माने चेहरों में कर्नल कोठियाल के अलावा विजय ज़ख्मोला, पूर्व आईएएस अनंतराम चौहान, सुवर्धन शाह, राज्य आंदोलनकारी रविंद्र जुगरान जैसे बड़े नाम शामिल थे। लेकिन यह लोग भी धीरे-धीरे पार्टी से किनारा करते चले गए। नाम ना उजागर करने की शर्त पर पार्टी कार्यकर्ता बताते हैं की पार्टी प्रभारी और सह प्रभारी के समानांतर सत्ता और अहंकार भरे व्यवहार के चलते ही पार्टी को इस स्थिति में ला दिया है।

उत्तराखंड में अपना राजनीतिक भविष्य तलाश रहे आम आदमी पार्टी के भीतर चल रही गुटबाजी और खींचतान ने उसे काफी नुकसान पहुंचाया है। ऐसे में आने वाले समय में क्या आम आदमी पार्टी फिर से उठने की कोशिश करेगी। या फिर उत्तराखंड क्रांति दल की तरह ही आम आदमी पार्टी भी भाजपा और कांग्रेस के बीच पर किस कर रह जाएगी।

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