करवटें बदलती पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति

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करवटें बदलती पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति

मशाहिद अब्बास

करवटें बदलती पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति

उत्तर प्रदेश को सियासत का गढ़ माना जाता है। दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर गुज़रता है इसमें कोई भी दो राय नहीं है। यही वजह है कि हर राजनीतिक दल उत्तर प्रदेश में अपना आधार चाहते हैं। भारतीय जनता पार्टी ने भी वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश पर खूब जान झोंक रखी थी, जिसका बंपर फायदा बटोर कर वह केंद्र की सत्ता पर काबिज हो गई थी। इस जीत के बावजूद भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश में खुद को कमज़ोर नहीं होने दिया और राज्य की अखिलेश यादव की सरकार को उखाड़ फेंका। उसके बाद वर्ष 2019 के आम चुनाव में भी भारतीय जनता पार्टी ने राज्य की सपा-बसपा की मज़बूत जोड़ी को चारों खाने चित कर दिया। मौजूदा वक्त में भाजपा एक मज़बूत संख्याबल के साथ राज्य की सत्ता पर काबिज है। राज्य में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। राजनीतिक दलों का गुणा-गणित जारी है। उत्तर प्रदेश में भाजपा को पटखनी देनी के लिए सपा प्रमुख अखिलेश यादव हर दिन नए शहर का दौरा कर रहे हैं। बसपा सुप्रीमो भी इनदिनों दिल्ली के बजाय लखनऊ में अधिक वक्त गुज़ार रही हैं और पार्टी के आलाकमान नेताओं के साथ बैठकों पर बैठक कर रही हैं। उत्तर प्रदेश की सियासत में अरविंद केजरीवाल और असदउद्दीन ओवैसी की भी इंट्री हो चुकी है। वहीं राज्य की सियासत में लंबे समय से कमज़ोर चलती आ रही कांग्रेस पार्टी भी उत्तर प्रदेश की सियासत में एक नए रंग रूप के साथ वापसी कर रही है। जिसकी कमान प्रियंका गांधी संभाले हुए हैं। प्रियंका गांधी पिछले तीन सालों से योगी सरकार को हर मौके पर घेरते हुए नज़र आयी हैं। प्रियंका गांधी राज्य के हर मुद्दों को पुरजोर तरीके से उठा रही हैं और तमाम तरह के घटनास्थलों पर भी पहुंच कर पीड़ितों की आवाज़ बन रही हैं। प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश की सियासत में पूरी तरह से घुल-मिल जाना चाह रही हैं, इसीलिए कुंभ मेले में जाकर डुबकी लगाने की बात रही हो या फिर मथुरा स्थित मंदिर के दर्शन की बात। प्रियंका गांधी कांग्रेस की नौका को पार लगाने की हर संभव कोशिशों में जुटी हुई हैं।

उत्तर प्रदेश में भले विधानसभा का चुनाव अगले साल होगा, लेकिन राज्य में सियासत अपने पूरे शबाब के साथ जारी है। इस समय पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन जारी है। जहां हर राजनीतिक दल अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही है। एक समय में उत्तर प्रदेश के पश्चिमी इलाकों में कांग्रेस का वर्चस्व था जो बाद में चौधरी चरण सिंह के हाथ लग गया था और फिर बसपा और रालोद के बीच ही पश्चिमी इलाकों की राजनीतिक करवट बदलती रही। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने इन्हीं पश्चिमी इलाकों के सहारे पूरे उत्तर प्रदेश की सत्ता हासिल कर ली थी। उत्तर प्रदेश की पश्चिमी इलाके में मुख्य शहर सहारनपुर, कैराना, मुजफ्फरनगर, मेरठ, बागपत, गाज़ियाबाद और बिजनौर जैसे शहर हैं। इन तमाम जिलों पर सीधी लड़ाई में मौजूदा वक्त में विपक्षी दलों की सीधी टक्कर भाजपा से ही है। किसान आंदोलन में अधिकतर जाट समाज हिस्सा ले रहा है जोकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अच्छी संख्या में हैं। कांग्रेस, रालोद, सपा और आम आदमी पार्टी पूरी तरह से किसानों के साथ खड़े हुए हैं। वहीं उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार कशमकश में है कि वह क्या प्रतिक्रिया दे। वह किसी भी कीमत पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खुद को कमज़ोर नहीं होने देना चाहती है। यही वजह है कि किसानों के नेता राकेश टिकैत पर एफआईआर के बावजूद किसी भी तरह की कोई कार्यवाई नहीं हो रही है।

भाजपा को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में वोटबैंक खिसकने का डर भी सता रहा है। इसीलिेए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह को मेरठ जनपद का प्रभारी नियुक्त कर दिया गया है। राजनाथ सिंह का पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में अच्छा खासा असर है और किसानों के नेता राकेश व नरेश टिकैत से अच्छे संबंध भी हैं। भाजपा राजनाथ सिंह के सहारे ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति पर कंट्रोल करना चाह रही है। वहीं किसान आंदोलन का सबसे अधिक फायदा रालोद को पहुंचता दिखाई दे रहा है। नरेश टिकैत सहित कई किसानों के नेता मंच पर यह बात कह चुके हैं कि चौधरी अजीत सिंह को हराकर उन लोगों ने बहुत बड़ी गलती की है। अगर संसद में अजीत सिंह होते तो वह उनकी आवाज़ ज़रूर बनते। किसान आंदोलन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रालोद की वापसी का सबसे अच्छा ज़रिया बन चुका है।

हालांकि अभी किसान आंदोलन जारी है ऐसे में उससे होने वाले नफा-नुकसान को गिनना जल्दबाजी ही होगी। किसान आंदोलन का भविष्य क्या है और यह कितना लंबा चलने वाला है ये ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति की दिशा और दशा तय करेगा। फिलहाल भाजपा पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सैकड़ों विधानसभा सीटों पर कोई भी खतरा मोल लेने से ज़रूर बचना चाहेगी। वह जाट समुदाय की नाराज़गी को दूर करने के लिए कौन सा ट्रंप कार्ड खेलती है यह तो वक्त तय करेगा फिलहाल किसान आंदोलन के चलते उत्तर प्रदेश की राजनीति करवटें तेज़ी के साथ बदल रही हैं.

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