क्योंकि मोदी जानते हैं कि सूरज पश्चिम में अस्त होता है!

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क्योंकि मोदी जानते हैं कि सूरज पश्चिम में अस्त होता है!

  • नवेद शिकोह
क्योंकि मोदी जानते हैं कि सूरज पश्चिम में अस्त होता है!
नवेद शिकोह

रामानंद सागर की रामायण और बी.आर.चोपड़ा के महाभारत के कई प्रसंगों जैसी झलक देश की सत्ता के मौजूदा महाभारत में अक्सर झलकती है। देश की आजादी की लड़ाई दो मोर्चों पर लड़ी गई थी। एक नरम दल और दूसरा गरम दल। युद्ध हो राजनीति या सत्ता संचालन, यहां भी गरम और नरम दोनों ताकतों को समय और परिस्थिति के लिहाज़ से अपनाया जाता है। धर्मयुद्ध में लक्ष्मण जब क्रोधित होते हैं तो श्री राम शांत मन और मस्तिष्क से फैसला लेने का उपदेश देते हैं। इसी तरह महाभारत में श्री कृष्ण अर्जुन को युद्ध की रणनीति के उपदेश देते हैं। सख्त फैसले और उसका क्रियान्वयन सत्ता की कार्यकुशलता है। किंतु कुछ विषम परिस्थितियों में सख्त कदम या क्रोध कई समस्याओं को और भी बढ़ा देता है जबकि वार्ता, धैर्य, संयम, मीठी वाणी और सकारात्मक कदम बिगड़े कार्यों का हल निकालने में सहायक साबित होते हैं।

यदि उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन की आग फैल गई तो भाजपा के लिए ये घातक होगा। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की खाप पंचायतों की सक्रियता यहां किसान आंदोलन को आकार देने लगी हैं। इससे पहले दिल्ली बार्डर, पंजाब, हरियाणा, थोड़ा बहुत राजस्थान के अलावा आंदोलन का यूपी में असर दाल में नमक के बराबर ही था। योगी सरकार के खुफिया, पुलिसिया और सूचना तंत्र ने अपनी कार्यकुशलता, विवेक और सख्त फैसलों से आंदोलन की आग को यूपी में नहीं बढ़ने दिया था। किंतु 28 जनवरी के बाद भारतीय किसान पार्टी के नेता राकेश टिकैत के आसुओं ने इस आंदोलन को यूपी में गति दे दी।

कहा जाता है कि दिल्ली की कुर्सी उत्तर प्रदेश तय करता है और यूपी की कुर्सी का रास्ता पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान बाहुल्य उत्तर प्रदेश से होकर गुजरता है। यहां के जाटों/किसानों की एक आदत, स्वभाव और अदा है। आपसे खुश हैं तो एकजुट होकर आप पर आंख बंद करके विश्वास करेंगे। नाराज हो गए तो सामूहिक रूप से नाराजगी का अहसास भी दिला देंगे । ना जाने कितनी राजनीतिक पार्टियों की यूपी की सत्ता का सूरज पश्चिमी उत्तर प्रदेश से डूबा है।
इस सच को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बखूबी समझते है। करीब एक वर्ष के दरम्यान यूपी के विधानसभा चुनावों की तारीख आ जानी है। ये सूबा भाजपा की सफलता-असफलता और बढ़ते जनाधार-गिरते जनाधार का सूचक कहलाता है। इसलिए यूपी में चुनावी वर्ष में किसान आंदोलन को बढ़ने से रोकने के लिए भाजपा शीर्ष नेतृत्व कोई कसर नहीं छोड़ेगा । यही कारण हैं कि प्रधानमंत्री. नरेंद्र मोदी खुद इस गतिरोध को खत्म करने के लिए आगे आ गए हैं। 26 जनवरी की घटना के बाद बात काफी बिगड़ने, किसान नेताओं पर राष्ट्र द्रोह जैसे मुकदमें दर्ज होने और इनकी गिरफ्तारी की तैयारी जैसे माहौल के बाद भी प्रधानमंत्री मोदी किसान आंदोलनकारियों से नर्म रुख अपनाते हुए पुनः बातचीत के द्वार खोल रहे हैं।

शनिवार को उन्होंने सर्वदलीय बैठक में कहा कि सरकार और किसान संयुक्त मोर्चा के बीच बातचीत और समझौते के दरवाजे खुले हैं। कृषि मंत्री और नाराज किसानों के बीच एक फोन संपर्क जोड़ देगा। प्रधानमंत्री का ये रुख उत्तर प्रदेश की योगी सरकार को आंदोलनकारी किसानों के प्रति नर्म होने का बड़ा और अहम संदेश भी दे रहा है।

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने बीते चार वर्षों के दौरान बड़ी-बड़ी चुनौतियों का कुशलतापूर्वक मुकाबला किया और हर चक्रव्यूह को तोड़कर विरोधियों की हर चाल और विषम पस्थितियों की हर मुश्किल घड़ी को परास्त किया। योगी सरकार के रथ का हर घोड़ा अपनी नालों से चिंगारियां बरसाता हुआ तेजी से सफलता के रास्तों पर आगे बढ़ता रहा है। किंतु कभी-कभी कहीं-कहीं हठ योग,कड़े फैसले और सख्त क़दम घातक भी साबित हो जाते हैं। श्री राम- लक्ष्मण की आस्था के केंद्र उत्तर प्रदेश की सत्ता चलाने में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सत्ता चलाने में हर कठिन परिस्थितियों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मार्गदर्शन, दिशानिर्देश और नेतृत्व मददगार साबित होता रहा है। कई बार मुश्किल घड़ी में कड़े फैसलों के बजाय नर्म रुख अपनाना बेहतर होता है। सत्ता की बागडोर संभालने के शुरुआती दौर में दिमागी बुखार में बच्चों की मौत, कानपुर में पुलिस नरसंहार और दुर्दांत अपराधी विकास दुबे का इनकाउंटर, बुलंदशहर में भीड़ द्वारा पुलिस इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह की हत्या, इसके बाद हाथरस कांड और अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पैर पसारता किसान आंदोलन ..

इन तमाम मुश्किल दौरों में यूपी की सत्ता को घेरते विरोधियों ने जब ऐसे मामलों को हवा दी और ऐसे प्रकरण गंभीर रुख अपनाने लगे तो केंद्र की मौनीटरिंग तेज हुई और मामले को संभालने के लिए उपयुक्त कदम उठाए गए। अब देखना है कि योगी के यूपी को किसान आंदोलन की मुसीबत से मोदी की कार्यकुशलता कैसे बचाती है।

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