मेरठ। विधानसभा चुनाव 2022 – प्रदेश में विधानसभा चुनाव के दौरान छोटे दलों का भाव इस समय काफी बढ़ा हुआ है। जिसके दम पर वो बड़ी पार्टियों से गठबंधन कर मोलभाव कर रहे हैं। ये छोटे दल इस समय बड़ी पार्टियों के लिए काफी परेशानी उत्पन्न कर रहे हैं। लेकिन इस समय ये छोटे बड़े दलों की मजबूरी बने हुए हैं। भाजपा,कांग्रेस, सपा और बसपा की मजबूरी है कि इन छोटे दलों केा गले लगाए बिना विधानसभा चुनाव की नैया पार करनी मुश्किल है। इस समय भाजपा से लेकर सपा और कांग्रेस से लेकर बसपा तक अपने स्तर से 2022 का चुनाव जीतकर सरकार बनाने का सपना देख रही है। भाजपा की कोशिश एक बार फिर से योगी पार्ट 2 दोहरने की है। इन बड़ी पार्टियों के साथ चुनावी भविष्य की तलाश में छोटी पार्टियां भी लगी हैं। लेकिन चुनाव कोई भी हो कुछ समय के लिए छोटी पार्टियों के नखरे बड़े हो जाते हैं लेकिन चुनाव के दौरान जो चाहत ये दल करते हैं वो चाहत चुनाव के बाद पूरी नहीं हेा पाती है। फिर चाहे ये दल सत्ता के साथ रहे या फिर विपक्ष के साथ आए।
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ये हैं प्रदेश के प्रमुख छोटे दल :—
चुनाव में भविष्य तलाश रहे इस छोटे दलों में रालोद,सुभासपा, अपना दल, निषाद पार्टी,आजाद समाज पार्टी,लोकदल प्रमुख है। एक समय था जब सपा और बसपा भी छोटी पार्टियों में शुमार होती थी। बसपा ने कभी भाजपा के दम पर प्रदेश में सरकार बनाई थी। वहीं एक बार सपा और बसपा अपने फार्मूले पर सरकार बना चुकी हैं। ये बात अलग है कि सपा बसपा का यह फार्मूला बाद में फेल साबित हुआ था। पिछले तीन चुनाव से प्रदेश के राजनैतिक स्थिति पर नजर डाले तो यह तय है कि अब प्रदेश का मतदाता पूर्ण रूप से किसी भी दल को बहुमत देता आ रहा है। पहले 2007 में जहां बसपा की सरकार बनवाई वहीं 2012 में सपा की सरकार मतदाताओं ने पूर्ण बहुमत से बनवाई थी। उसके बाद 2017 में भाजपा की सरकार बनी। पूर्ण बहुमत के लिए 403 विधानसभा सीटों में 202 सीटे जीतना जरूरी होता है। जिसके पास 202 का जदुई आंकड़ा होता है उसी की प्रदेश में सरकार भी बनती है। लेकिन इस बार के चुनाव में सभी दलों के लिए परिस्थिति अलग हैं। यहीं कारण है कि भाजपा और अन्य दल इन छोटे दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या उप्र की राजनीति में बड़े दलों को अपने अस्तित्व का खतरा सताने लगा है या फिर इन क्षेत्रीय दलों की ताकत का अहसास बड़े दलों को चुका है। इतना तो तय है कि ये दल अपने क्षेत्र में राजनीतिक महत्व के साथ अपना प्रभाव भी रखते हैं। यूपी की राजनीति वैसे भी क्षेत्रीय और जातिस्तर पर अधिक टिकी हुई है। यह भी तय है कि इस चुनाव में ये दल बहुत बड़ा असर डालेगे।

